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भजन संहिता

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भजन संहित 81 ↟↟

  1. परमेश्वर जो हमारा बल है, उसका गीत आनन्द से गाओ, याकूब के परमेश्वर का जयजयकार करो.
  2. भजन उठाओ, डफ और मधुर बजने वाली वीणा और सारंगी को ले आओ।
  3. नये चाँद के दिन, और पूर्णमासी को हमारे पर्व के दिन नरसिंगा फूंको।
  4. क्योंकि यह इस्त्राएल के लिये विधि, और याकूब के परमेश्वर का ठहराया हुआ नियम है।
  5. इस को उसने यूसुफ में चितौनी की रीति पर उस समय चलाया, जब वह मिस्त्र देश के विरुद्ध चला॥ वहां मैं ने एक अनजानी भाषा सुनी,
  6. मैं ने उनके कन्धों पर से बोझ को उतार दिया, उनका टोकरी ढोना छुट गया।
  7. तू ने संकट में पड़ कर पुकारा, तब मैं ने तुझे छुड़ाया, बादल गरजने के गुप्त स्थान में से मैं ने तेरी सुनी, और मरीबा नाम सोते के पास तेरी परीक्षा की। (सेला)
  8. हे मेरी प्रजा, सुन, मैं तुझे चिता देता हूं. हे इस्त्राएल भला हो कि तू मेरी सुने.
  9. तेरे बीच में पराया ईश्वर न हो, और न तू किसी पराए देवता को दणडवत करना.
  10. 0तेरा परमेश्वर यहोवा मैं हूं, जो तुझे मिस्त्र देश से निकाल लाया है। तू अपना मुंह पसार, मैं उसे भर दूंगा॥
  11. 1परन्तु मेरी प्रजा ने मेरी न सुनी, इस्त्राएल ने मुझ को न चाहा।
  12. 2इसलिये मैं ने उसको उसके मन के हठ पर छोड़ दिया, कि वह अपनी ही युक्तियों के अनुसार चले।
  13. 3यदि मेरी प्रजा मेरी सुने, यदि इस्त्राएल मेरे मार्गों पर चले,
  14. 4तो क्षण भर में उनके शत्रुओं को दबाऊं, और अपना हाथ उनके द्रोहियों के विरुद्ध चलाऊं।
  15. 5यहोवा के बैरी तो उस के वश में हो जाते, और उनका अन्त सदाकाल तक बना रहता हैं।
  16. 6और उनको उत्तम से उत्तम गेहूं खिलाता, और मैं चट्टान में के मधु से उन को तृप्त करूं॥

भजन संहित 82 ↟↟

  1. परमेश्वर की सभा में परमेश्वर ही खड़ा है, वह ईश्वरों के बीच में न्याय करता है।
  2. तुम लोग कब तक टेढ़ा न्याय करते और दुष्टों का पक्ष लेते रहोगे?
  3. कंगाल और अनाथों का न्याय चुकाओ, दीन दरिद्र का विचार धर्म से करो।
  4. कंगाल और निर्धन को बचा लो, दुष्टों के हाथ से उन्हें छुड़ाओ॥
  5. वे न तो कुछ समझते और न कुछ बूझते हैं, परन्तु अन्धेरे में चलते फिरते रहते हैं, पृथ्वी की पूरी नीव हिल जाती है॥
  6. मैं ने कहा था कि तुम ईश्वर हो, और सब के सब परमप्रधान के पुत्र हो,
  7. तौभी तुम मनुष्यों की नाईं मरोगे, और किसी प्रधान के समान गिर जाओगे॥
  8. हे परमेश्वर उठ, पृथ्वी का न्याय कर, क्योंकि तू ही सब जातियों को अपने भाग में लेगा.

भजन संहित 83 ↟↟

  1. हे परमेश्वर मौन न रह, हे ईश्वर चुप न रह, और न शांत रह.
  2. क्योंकि देख तेरे शत्रु धूम मचा रहे हैं, और तेरे बैरियों ने सिर उठाया है।
  3. वे चतुराई से तेरी प्रजा की हानि की सम्मति करते, और तेरे रक्षित लोगों के विरुद्ध युक्तियां निकालते हैं।
  4. उन्होंने कहा, आओ, हम उन को ऐसा नाश करें कि राज्य भी मिट जाए, और इस्त्राएल का नाम आगे को स्मरण न रहे।
  5. उन्होंने एक मन हो कर युक्ति निकाली है, और तेरे ही विरुद्ध वाचा बान्धी है।
  6. ये तो एदोम के तम्बू वाले और इश्माइली, मोआबी और हुग्री,
  7. गबाली, अम्मोनी, अमालेकी, और सोर समेत पलिश्ती हैं।
  8. इनके संग अश्शूरी भी मिल गए हैं, उन से भी लूतवंशियों को सहारा मिला है।
  9. इन से ऐसा कर जैसा मिद्यानियों से, और कीशोन नाले में सीसरा और याबीन से किया था, जो एन्दोर में नाश हुए,
  10. 0और भूमि के लिये खाद बन गए।
  11. 1इनके रईसों को ओरेब और जाएब सरीखे, और इनके सब प्रधानों को जेबह और सल्मुन्ना के समान कर दे,
  12. 2जिन्होंने कहा था, कि हम परमेश्वर की चराइयों के अधिकारी आप ही हो जाएं॥
  13. 3हे मेरे परमेश्वर इन को बवन्डर की धूलि, वा पवन से उड़ाए हुए भूसे के समान कर दे।
  14. 4उस आग की नाईं जो वन को भस्म करती है, और उस लौ की नाईं जो पहाड़ों को जला देती है,
  15. 5तू इन्हे अपनी आंधी से भाग दे, और अपने बवन्डर से घबरा दे.
  16. 6इनके मुंह को अति लज्जित कर, कि हे यहोवा ये तेरे नाम को ढूंढ़ें।
  17. 7ये सदा के लिये लज्जित और घबराए रहें इनके मुंह काले हों, और इनका नाश हो जाए,
  18. 8जिस से यह जानें कि केवल तू जिसका नाम यहोवा है, सारी पृथ्वी के ऊपर परमप्रधान है॥

भजन संहित 84 ↟↟

  1. हे सेनाओं के यहोवा, तेरे निवास क्या ही प्रिय हैं.
  2. मेरा प्राण यहोवा के आंगनों की अभिलाषा करते करते मूर्छित हो चला, मेरा तन मन दोनों जीवते ईश्वर को पुकार रहे॥
  3. हे सेनाओं के यहोवा, हे मेरे राजा, और मेरे परमेश्वर, तेरी वेदियों मे गौरैया ने अपना बसेरा और शूपाबेनी ने घोंसला बना लिया है जिस में वह अपने बच्चे रखे।
  4. क्या ही धन्य हैं वे, जो तेरे भवन में रहते हैं, वे तेरी स्तुति निरन्तर करते रहेंगे॥
  5. क्या ही धन्य है, वह मनुष्य जो तुझ से शक्ति पाता है, और वे जिन को सिय्योन की सड़क की सुधि रहती है।
  6. वे रोने की तराई में जाते हुए उसको सोतों का स्थान बनाते हैं, फिर बरसात की अगली वृष्टि उसमें आशीष ही आशीष उपजाती है।
  7. वे बल पर बल पाते जाते हैं, उन में से हर एक जन सिय्योन में परमेश्वर को अपना मुंह दिखाएगा॥
  8. हे सेनाओं के परमेश्वर यहोवा, मेरी प्रार्थना सुन, हे याकूब के परमेश्वर, कान लगा.
  9. हे परमेश्वर, हे हमारी ढ़ाल, दृष्टि कर, और अपने अभिषिक्ति का मुख देख.
  10. 0क्योंकि तेरे आंगनों में का एक दिन और कहीं के हजार दिन से उत्तम है। दुष्टों के डेरों में वास करने से अपने परमेश्वर के भवन की डेवढ़ी पर खड़ा रहना ही मुझे अधिक भावता है।
  11. 1क्योंकि यहोवा परमेश्वर सूर्य और ढाल है, यहोवा अनुग्रह करेगा, और महिमा देगा, और जो लोग खरी चाल चलते हैं, उन से वह कोई अच्छा पदार्थ रख न छोड़ेगा।
  12. 2हे सेनाओं के यहोवा, क्या ही धन्य वह मनुष्य है, जो तुझ पर भरोसा रखता है.

भजन संहित 85 ↟↟

  1. हे यहोवा, तू अपने देश पर प्रसन्न हुआ, याकूब को बन्धुआई से लौटा ले आया है।
  2. तू ने अपनी प्रजा के अधर्म को क्षमा किया है, और उसके सब पापों को ढांप दिया है।
  3. तू ने अपने रोष को शान्त किया है, और अपने भड़के हुए कोप को दूर किया है॥
  4. हे हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर हम को फेर, और अपना क्रोध हम पर से दूर कर.
  5. क्या तू हम पर सदा कोपित रहेगा? क्या तू पीढ़ी से पीढ़ी तक कोप करता रहेगा?
  6. क्या तू हम को फिर न जिलाएगा, कि तेरी प्रजा तुझ में आनन्द करे?
  7. हे यहोवा अपनी करूणा हमें दिखा, और तू हमारा उद्धार कर॥
  8. मैं कान लगाए रहूंगा, कि ईश्वर यहोवा क्या कहता है, वह तो अपनी प्रजा से जो उसके भक्त है, शान्ति की बातें कहेगा, परन्तु वे फिर के मूर्खता न करने लगें।
  9. निश्चय उसके डरवैयों के उद्धार का समय निकट है, तब हमारे देश में महिमा का निवास होगा॥
  10. 0करूणा और सच्चाई आपस में मिल गई हैं, धर्म और मेल ने आपस में चुम्बन किया है।
  11. 1पृथ्वी में से सच्चाई उगती और स्वर्ग से धर्म झुकता है।
  12. 2फिर यहोवा उत्तम पदार्थ देगा, और हमारी भूमि अपनी उपज देगी।
  13. 3धर्म उसके आगे आगे चलेगा, और उसके पांवों के चिन्हों को हमारे लिये मार्ग बनाएगा॥

भजन संहित 86 ↟↟

  1. हे यहोवा कान लगा कर मेरी सुन ले, क्योंकि मैं दीन और दरिद्र हूं।
  2. मेरे प्राण की रक्षा कर, क्योंकि मैं भक्त हूं, तू मेरा परमेश्वर है, इसलिये अपने दास का, जिसका भरोसा तुझ पर है, उद्धार कर।
  3. हे प्रभु मुझ पर अनुग्रह कर, क्योंकि मैं तुझी को लगातार पुकारता रहता हूं।
  4. अपने दास के मन को आनन्दित कर, क्योंकि हे प्रभु, मैं अपना मन तेरी ही ओर लगाता हूं।
  5. क्योंकि हे प्रभु, तू भला और क्षमा करने वाला है, और जितने तुझे पुकारते हैं उन सभों के लिये तू अति करूणामय है।
  6. हे यहोवा मेरी प्रार्थना की ओर कान लगा, और मेरे गिड़गिड़ाने को ध्यान से सुन।
  7. संकट के दिन मैं तुझ को पुकारूंगा, क्योंकि तू मेरी सुन लेगा॥
  8. हे प्रभु देवताओं में से कोई भी तेरे तुल्य नहीं, और ने किसी के काम तेरे कामों के बराबर हैं।
  9. हे प्रभु जितनी जातियों को तू ने बनाया है, सब आकर तेरे साम्हने दणडवत करेंगी, और तेरे नाम की महिमा करेंगी।
  10. 0क्योंकि तू महान और आश्चर्य कर्म करने वाला है, केवल तू ही परमेश्वर है।
  11. 1हे यहोवा अपना मार्ग मुझे दिखा, तब मैं तेरे सत्य मार्ग पर चलूंगा, मुझ को एक चित्त कर कि मैं तेरे नाम का भय मानूं।
  12. 2हे प्रभु हे मेरे परमेश्वर मैं अपने सम्पूर्ण मन से तेरा धन्यवाद करूंगा, और तेरे नाम की महिमा सदा करता रहूंगा।
  13. 3क्योंकि तेरी करूणा मेरे ऊपर बड़ी है, और तू ने मुझ को अधोलोक की तह में जाने से बचा लिया है॥
  14. 4हे परमेश्वर अभिमानी लोग तो मेरे विरुद्ध उठे हैं, और बलात्कारियों का समाज मेरे प्राण का खोजी हुआ है, और वे तेरा कुछ विचार नहीं रखते।
  15. 5परन्तु प्रभु तू दयालु और अनुग्रहकारी ईश्वर है, तू विलम्ब से कोप करने वाला और अति करूणामय है।
  16. 6मेरी ओर फिर कर मुझ पर अनुग्रह कर, अपने दास को तू शक्ति दे, और अपनी दासी के पुत्र का उद्धार कर॥
  17. 7मुझे भलाई का कोई लक्षण दिखा, जिसे देख कर मेरे बैरी निराश हों, क्योंकि हे यहोवा तू ने आप मेरी सहायता की और मुझे शान्ति दी है॥

भजन संहित 87 ↟↟

  1. उसकी नेव पवित्र पर्वतों में है,
  2. और यहोवा सिय्योन के फाटकों को याकूब के सारे निवासों से बढ़ कर प्रीति रखता है।
  3. हे परमेश्वर के नगर, तेरे विषय महिमा की बातें कही गई हैं।
  4. मैं अपने जान- पहचान वालों से रहब और बाबेल की भी चर्चा करूंगा, पलिश्त, सोर और कूश को देखो, यह वहां उत्पन्न हुआ था।
  5. और सिय्योन के विषय में यह कहा जाएगा, कि अमुक अमुक मनुष्य उस में उत्पन्न हुआ था, और परमप्रधान आप ही उसको स्थिर रखेगा।
  6. यहोवा जब देश देश के लोगों के नाम लिख कर गिन लेगा, तब यह कहेगा, कि यह वहां उत्पन्न हुआ था॥
  7. गवैये और नृतक दोनों कहेंगे कि हमारे सब सोते तुझी में पाए जाते हैं॥

भजन संहित 88 ↟↟

  1. हे मेरे उद्धारकर्ता परमेश्वर यहोवा, मैं दिन को और रात को तेरे आगे चिल्लाता आया हूं।
  2. मेरी प्रार्थना तुझ तक पहुंचे, मेरे चिल्लाने की ओर कान लगा.
  3. क्योंकि मेरा प्राण क्लेश में भरा हुआ है, और मेरा प्राण अधोलोक के निकट पहुंचा है।
  4. मैं कबर में पड़ने वालों में गिना गया हूं, मैं बलहीन पुरूष के समान हो गया हूं।
  5. मैं मुर्दों के बीच छोड़ा गया हूं, और जो घात हो कर कबर में पड़े हैं, जिन को तू फिर स्मरण नहीं करता और वे तेरी सहायता रहित हैं, उनके समान मैं हो गया हूं।
  6. तू ने मुझे गड़हे के तल ही में, अन्धेरे और गहिरे स्थान में रखा है।
  7. तेरी जलजलाहट मुझी पर बनी हुई है, और तू ने अपने सब तरंगों से मुझे दु:ख दिया है,
  8. तू ने मेरे पहिचान वालों को मुझ से दूर किया है, और मुझ को उनकी दृष्टि में घिनौना किया है। मैं बन्दी हूं और निकल नही सकता,
  9. दु:ख भोगते भोगते मेरी आंखे धुन्धला गई। हे यहोवा मैं लगातार तुझे पुकारता और अपने हाथ तेरी ओर फैलाता आया हूं।
  10. 0क्या तू मुर्दों के लिये अदभुत काम करेगा? क्या मरे लोग उठ कर तेरा धन्यवाद करेंगे?
  11. 1क्या कबर में तेरी करूणा का, और विनाश की दशा में तेरी सच्चाई का वर्णन किया जाएगा?
  12. 2क्या तेरे अदभुत काम अन्धकार में, वा तेरा धर्म विश्वासघात की दशा में जाना जाएगा?
  13. 3परन्तु हे यहोवा, मैं ने तेरी दोहाई दी है, और भोर को मेरी प्रार्थना तुझ तक पहुंचेगी।
  14. 4हे यहोवा, तू मुझ को क्यों छोड़ता है? तू अपना मुख मुझ से क्यों छिपाता रहता है?
  15. 5मैं बचपन ही से दु:खी वरन अधमुआ हूं, तुझ से भय खाते मैं अति व्याकुल हो गया हूं।
  16. 6तेरा क्रोध मुझ पर पड़ा है, उस भय से मैं मिट गया हूं।
  17. 7वह दिन भर जल की नाईं मुझे घेरे रहता है, वह मेरे चारों ओर दिखाई देता है।
  18. 8तू ने मित्र और भाईबन्धु दोनों को मुझ से दूर किया है, और मेरे जान-पहिचान वालों को अन्धकार में डाल दिया है॥

भजन संहित 89 ↟↟

  1. मैं यहोवा की सारी करूणा के विषय सदा गाता रहूंगा, मैं तेरी सच्चाई पीढ़ी पीढ़ी तक जताता रहूंगा।
  2. क्योंकि मैं ने कहा है, तेरी करूणा सदा बनी रहेगी, तू स्वर्ग में अपनी सच्चाई को स्थिर रखेगा।
  3. मैं ने अपने चुने हुए से वाचा बान्धी है, मैं ने अपने दास दाऊद से शपथ खाई है,
  4. कि मैं तेरे वंश को सदा स्थिर रखूंगा, और तेरी राजगद्दी को पीढ़ी पीढ़ी तक बनाए रखूंगा।
  5. हे यहोवा, स्वर्ग में तेरे अद्भुत काम की, और पवित्रों की सभा में तेरी सच्चाई की प्रशंसा होगी।
  6. क्योंकि आकाश मण्डल में यहोवा के तुल्य कौन ठहरेगा? बलवन्तों के पुत्रों में से कौन है जिसके साथ यहोवा की उपमा दी जाएगी?
  7. ईश्वर पवित्रों की गोष्ठी में अत्यन्त प्रतिष्ठा के योग्य, और अपने चारों ओर सब रहने वालों से अधिक भय योग्य है।
  8. हे सेनाओं के परमेश्वर यहोवा, हे याह, तेरे तुल्य कौन सामर्थी है? तेरी सच्चाई तो तेरे चारों ओर है.
  9. समुद्र के गर्व को तू ही तोड़ता है, जब उसके तरंग उठते हैं, तब तू उन को शान्त कर देता है।
  10. 0तू ने रहब को घात किए हुए के समान कुचल डाला, और अपने शत्रुओं को अपने बाहुबल से तितर बितर किया है।
  11. 1आकाश तेरा है, पृथ्वी भी तेरी है, जगत और जो कुछ उस में है, उसे तू ही ने स्थिर किया है।
  12. 2उत्तर और दक्खिन को तू ही ने सिरजा, ताबोर और हेर्मोन तेरे नाम का जयजयकार करते हैं।
  13. 3तेरी भुजा बलवन्त है, तेरा हाथ शक्तिमान और तेरा दहिना हाथ प्रबल है।
  14. 4तेरे सिंहासन का मूल, धर्म और न्याय है, करूणा और सच्चाई तेरे आगे आगे चलती है।
  15. 5क्या ही धन्य है वह समाज जो आनन्द के ललकार को पहिचानता है, हे यहोवा, वे लोग तेरे मुख के प्रकाश में चलते हैं,
  16. 6वे तेरे नाम के हेतु दिन भर मगन रहते हैं, और तेरे धर्म के कारण महान हो जाते हैं।
  17. 7क्योंकि तू उनके बल की शोभा है, और अपनी प्रसन्नता से हमारे सींग को ऊंचा करेगा।
  18. 8क्योंकि हमारी ढाल यहोवा की ओर से है हमारा राजा इस्राएल के पवित्र की ओर से है॥
  19. 9एक समय तू ने अपने भक्त को दर्शन देकर बातें की, और कहा, मैं ने सहायता करने का भार एक वीर पर रखा है, और प्रजा में से एक को चुन कर बढ़ाया है।
  20. 0मैं ने अपने दास दाऊद को लेकर, अपने पवित्र तेल से उसका अभिषेक किया है।
  21. 1मेरा हाथ उसके साथ बना रहेगा, और मेरी भुजा उसे दृढ़ रखेगी।
  22. 2शत्रु उसको तंग करने न पाएगा, और न कुटिल जन उसको दु:ख देने पाएगा।
  23. 3मैं उसके द्रोहियों को उसके साम्हने से नाश करूंगा, और उसके बैरियों पर विपत्ति डालूंगा।
  24. 4परन्तु मेरी सच्चाई और करूणा उस पर बनी रहेंगी, और मेरे नाम के द्वारा उसका सींग ऊंचा हो जाएगा।
  25. 5मैं समुद्र को उसके हाथ के नीचे और महानदों को उसके दाहिने हाथ के नीचे कर दूंगा।
  26. 6वह मुझे पुकार के कहेगा, कि तू मेरा पिता है, मेरा ईश्वर और मेरे बचने की चट्टान है।
  27. 7फिर मैं उसको अपना पहिलौठा, और पृथ्वी के राजाओं पर प्रधान ठहराऊंगा।
  28. 8मैं अपनी करूणा उस पर सदा बनाए रहूंगा, और मेरी वाचा उसके लिये अटल रहेगी।
  29. 9मैं उसके वंश को सदा बनाए रखूंगा, और उसकी राजगद्दी स्वर्ग के समान सर्वदा बनी रहेगी।
  30. 0यदि उसके वंश के लोग मेरी व्यवस्था को छोड़ें और मेरे नियमों के अनुसार न चलें,
  31. 1यदि वे मेरी विधियों का उल्लंघन करें, और मेरी आज्ञाओं को न मानें,
  32. 2तो मैं उनके अपराध का दण्ड सोंटें से, और उनके अधर्म का दण्ड कोड़ों से दूंगा।
  33. 3परन्तु मैं अपनी करूणा उस पर से न हटाऊंगा, और न सच्चाई त्याग कर झूठा ठहरूंगा।
  34. 4मैं अपनी वाचा न तोडूंगा, और जो मेरे मुंह से निकल चुका है, उसे न बदलूंगा।
  35. 5एक बार मैं अपनी पवित्राता की शपथ खा चुका हूं, मैं दाऊद को कभी धोखा न दूंगा।
  36. 6उसका वंश सर्वदा रहेगा, और उसकी राजगद्दी सूर्य की नाईं मेरे सम्मुख ठहरी रहेगी।
  37. 7वह चन्द्रमा की नाईं, और आकाश मण्डल के विश्वास योग्य साक्षी की नाईं सदा बना रहेगा।
  38. 8तौभी तू ने अपने अभिषिक्त को छोड़ा और उसे तज दिया, और उस पर अति क्रोध किया है।
  39. 9तू अपने दास के साथ की वाचा से घिनाया, और उसके मुकुट को भूमि पर गिरा कर अशुद्ध किया है।
  40. 0तू ने उसके सब बाड़ों को तोड़ डाला है, और उसके गढ़ों को उजाड़ दिया है।
  41. 1सब बटोही उसको लूट लेते हैं, और उसके पड़ोसियों में उसकी नामधराई होती है।
  42. 2तू ने उसके द्रोहियों को प्रबल किया, और उसके सब शत्रुओं को आनन्दित किया है।
  43. 3फिर तू उसकी तलवार की धार को मोड़ देता है, और युद्ध में उसके पांव जमने नहीं देता।
  44. 4तू ने उसका तेज हर लिया है और उसके सिंहासन को भूमि पर पटक दिया है।
  45. 5तू ने उसकी जवानी को घटाया, और उसको लज्जा से ढांप दिया है॥
  46. 6हे यहोवा तू कब तक लगातार मूंह फेरे रहेगा, तेरी जलजलाहट कब तक आग की नाईं भड़की रहेगी॥
  47. 7मेरा स्मरण कर, कि मैं कैसा अनित्य हूं, तू ने सब मनुष्यों को क्यों व्यर्थ सिरजा है?
  48. 8कौन पुरूष सदा अमर रहेगा? क्या कोई अपने प्राण को अधोलोक से बचा सकता है?
  49. 9हे प्रभु तेरी प्राचीनकाल की करूणा कहां रही, जिसके विषय में तू ने अपनी सच्चाई की शपथ दाऊद से खाई थी?
  50. 0हे प्रभु अपने दासों की नामधराई की सुधि कर, मैं तो सब सामर्थी जातियों का बोझ लिए रहता हूं।
  51. 1तेरे उन शत्रुओं ने तो हे यहोवा तेरे अभिषिक्त के पीछे पड़ कर उसकी नामधराई की है॥
  52. 2यहोवा सर्वदा धन्य रहेगा. आमीन फिर आमीन॥

भजन संहित 90 ↟↟

  1. हे प्रभु, तू पीढ़ी से पीढ़ी तक हमारे लिये धाम बना है।
  2. इस से पहिले कि पहाड़ उत्पन्न हुए, वा तू ने पृथ्वी और जगत की रचना की, वरन अनादिकाल से अनन्तकाल तक तू ही ईश्वर है॥
  3. तू मनुष्य को लौटा कर चूर करता है, और कहता है, कि हे आदमियों, लौट आओ.
  4. क्योंकि हजार वर्ष तेरी दृष्टि में ऐसे हैं, जैसा कल का दिन जो बीत गया, वा रात का एक पहर॥
  5. तू मनुष्यों को धारा में बहा देता है, वे स्वप्न से ठहरते हैं, वे भोर को बढ़ने वाली घास के समान होते हैं।
  6. वह भोर को फूलती और बढ़ती है, और सांझ तक कट कर मुर्झा जाती है॥
  7. क्योंकि हम तेरे क्रोध से नाश हुए हैं, और तेरी जलजलाहट से घबरा गए हैं।
  8. तू ने हमारे अधर्म के कामों से अपने सम्मुख, और हमारे छिपे हुए पापों को अपने मुख की ज्योति में रखा है॥
  9. क्योंकि हमारे सब दिन तेरे क्रोध में बीत जाते हैं, हम अपने वर्ष शब्द की नाईं बिताते हैं।
  10. 0हमारी आयु के वर्ष सत्तर तो होते हैं, और चाहे बल के कारण अस्सी वर्ष के भी हो जाएं, तौभी उनका घमण्ड केवल नष्ट और शोक ही शोक है, क्योंकि वह जल्दी कट जाती है, और हम जाते रहते हैं।
  11. 1तेरे क्रोध की शक्ति को और तेरे भय के योग्य तेरे रोष को कौन समझता है?
  12. 2हम को अपने दिन गिनने की समझ दे कि हम बुद्धिमान हो जाएं॥
  13. 3हे यहोवा लौट आ. कब तक? और अपने दासों पर तरस खा.
  14. 4भोर को हमें अपनी करूणा से तृप्त कर, कि हम जीवन भर जयजयकार और आनन्द करते रहें।
  15. 5जितने दिन तू हमें दु:ख देता आया, और जितने वर्ष हम क्लेश भोगते आए हैं उतने ही वर्ष हम को आनन्द दे।
  16. 6तेरा काम तेरे दासों को, और तेरा प्रताप उनकी सन्तान पर प्रगट हो।
  17. 7और हमारे परमेश्वर यहोवा की मनोहरता हम पर प्रगट हो, तू हमारे हाथों का काम हमारे लिये दृढ़ कर, हमारे हाथों के काम को दृढ़ कर॥

भजन संहित 91 ↟↟

  1. जो परमप्रधान के छाए हुए स्थान में बैठा रहे, वह सर्वशक्तिमान की छाया में ठिकाना पाएगा।
  2. मैं यहोवा के विषय कहूंगा, कि वह मेरा शरणस्थान और गढ़ है, वह मेरा परमेश्वर है, मैं उस पर भरोसा रखूंगा।
  3. वह तो तुझे बहेलिये के जाल से, और महामारी से बचाएगा,
  4. वह तुझे अपने पंखों की आड़ में ले लेगा, और तू उसके पैरों के नीचे शरण पाएगा, उसकी सच्चाई तेरे लिये ढाल और झिलम ठहरेगी।
  5. तू न रात के भय से डरेगा, और न उस तीर से जो दिन को उड़ता है,
  6. न उस मरी से जो अन्धेरे में फैलती है, और न उस महारोग से जो दिन दुपहरी में उजाड़ता है॥
  7. तेरे निकट हजार, और तेरी दाहिनी ओर दस हजार गिरेंगे, परन्तु वह तेरे पास न आएगा।
  8. परन्तु तू अपनी आंखों की दृष्टि करेगा और दुष्टों के अन्त को देखेगा॥
  9. हे यहोवा, तू मेरा शरण स्थान ठहरा है। तू ने जो परमप्रधान को अपना धाम मान लिया है,
  10. 0इसलिये कोई विपत्ति तुझ पर न पड़ेगी, न कोई दु:ख तेरे डेरे के निकट आएगा॥
  11. 1क्योंकि वह अपने दूतों को तेरे निमित्त आज्ञा देगा, कि जहां कहीं तू जाए वे तेरी रक्षा करें।
  12. 2वे तुझ को हाथों हाथ उठा लेंगे, ऐसा न हो कि तेरे पांवों में पत्थर से ठेस लगे।
  13. 3तू सिंह और नाग को कुचलेगा, तू जवान सिंह और अजगर को लताड़ेगा।
  14. 4उसने जो मुझ से स्नेह किया है, इसलिये मैं उसको छुड़ाऊंगा, मैं उसको ऊंचे स्थान पर रखूंगा, क्योंकि उसने मेरे नाम को जान लिया है।
  15. 5जब वह मुझ को पुकारे, तब मैं उसकी सुनूंगा, संकट में मैं उसके संग रहूंगा, मैं उसको बचा कर उसकी महिमा बढ़ाऊंगा।
  16. 6मैं उसको दीर्घायु से तृप्त करूंगा, और अपने किए हुए उद्धार का दर्शन दिखाऊंगा॥

भजन संहित 92 ↟↟

  1. यहोवा का धन्यवाद करना भला है, हे परमप्रधान, तेरे नाम का भजन गाना,
  2. प्रात:काल को तेरी करूणा, और प्रति रात तेरी सच्चाई का प्रचार करना,
  3. दस तार वाले बाजे और सारंगी पर, और वीणा पर गम्भीर स्वर से गाना भला है।
  4. क्योंकि, हे यहोवा, तू ने मुझ को अपने काम से आनन्दित किया है, और मैं तेरे हाथों के कामों के कारण जयजयकार करूंगा॥
  5. हे यहोवा, तेरे काम क्या ही बड़े हैं. तेरी कल्पनाएं बहुत गम्भीर हैं.
  6. पशु समान मनुष्य इस को नहीं समझता, और मूर्ख इसका विचार नहीं करता:
  7. कि दुष्ट जो घास की नाईं फूलते- फलते हैं, और सब अनर्थकारी जो प्रफुल्लित होते हैं, यह इसलिये होता है, कि वे सर्वदा के लिये नाश हो जाएं,
  8. परन्तु हे यहोवा, तू सदा विराजमान रहेगा।
  9. क्योंकि हे यहोवा, तेरे शत्रु, हां तेरे शत्रु नाश होंगे, सब अनर्थकारी तितर बितर होंगे॥
  10. 0परन्तु मेरा सींग तू ने जंगली सांढ़ का सा ऊंचा किया है, मैं टटके तेल से चुपड़ा गया हूं।
  11. 1और मैं अपने द्रोहियों पर दृष्टि कर के, और उन कुकर्मियों का हाल मेरे विरुद्ध उठे थे, सुनकर सन्तुष्ट हुआ हूं॥
  12. 2धर्मी लोग खजूर की नाईं फूले फलेंगे, और लबानोन के देवदार की नाईं बढ़ते रहेंगे।
  13. 3वे यहोवा के भवन में रोपे जा कर, हमारे परमेश्वर के आंगनों में फूले फलेंगे।
  14. 4वे पुराने होने पर भी फलते रहेंगे, और रस भरे और लहलहाते रहेंगे,
  15. 5जिस से यह प्रगट हो, कि यहोवा सीधा है, वह मेरी चट्टान है, और उस में कुटिलता कुछ भी नहीं॥

भजन संहित 93 ↟↟

  1. यहोवा राजा है, उसने माहात्म्य का पहिरावा पहिना है, यहोवा पहिरावा पहिने हुए, और सामर्थ्य का फेटा बान्धे है। इस कारण जगत स्थिर है, वह नहीं टलने का।
  2. हे यहोवा, तेरी राजगद्दी अनादिकाल से स्थिर है, तू सर्वदा से है॥
  3. हे यहोवा, महानदों का कोलाहल हो रहा है, महानदों का बड़ा शब्द हो रहा है, महानद गरजते हैं।
  4. महासागर के शब्द से, और समुद्र की महातरंगों से, विराजमान यहोवा अधिक महान है॥
  5. तेरी चितौनियां अति विश्वासयोग्य हैं, हे यहोवा तेरे भवन को युग युग पवित्रता ही शोभा देती है॥

भजन संहित 94 ↟↟

  1. हे यहोवा, हे पलटा लेने वाले ईश्वर, हे पलटा लेने वाले ईश्वर, अपना तेज दिखा.
  2. हे पृथ्वी के न्यायी उठ, और घमण्ड़ियों को बदला दे.
  3. हे यहोवा, दुष्ट लोग कब तक, दुष्ट लोग कब तक डींग मारते रहेंगे?
  4. वे बकते और ढ़िठाई की बातें बोलते हैं, सब अनर्थकारी बड़ाई मारते हैं।
  5. हे यहोवा, वे तेरी प्रजा को पीस डालते हैं, वे तेरे निज भाग को दु:ख देते हैं।
  6. वे विधवा और परदेशी का घात करते, और अनाथों को मार डालते हैं,
  7. और कहते हैं, कि याह न देखेगा, याकूब का परमेश्वर विचार न करेगा॥
  8. तुम जो प्रजा में पशु सरीखे हो, विचार करो, और हे मूर्खों तुम कब तक बुद्धिमान हो जाओगे?
  9. जिसने कान दिया, क्या वह आप नहीं सुनता? जिसने आंख रची, क्या वह आप नहीं देखता?
  10. 0जो जाति जाति को ताड़ना देता, और मनुष्य को ज्ञान सिखाता है, क्या वह न समझाएगा?
  11. 1यहोवा मनुष्य की कल्पनाओं को तो जानता है कि वे मिथ्या हैं॥
  12. 2हे याह, क्या ही धन्य है वह पुरूष जिस को तू ताड़ना देता है, और अपनी व्यवस्था सिखाता है,
  13. 3क्योंकि तू उसको विपत्ति के दिनों में उस समय तक चैन देता रहता है, जब तक दुष्टों के लिये गड़हा नहीं खोदा जाता।
  14. 4क्योंकि यहोवा अपनी प्रजा को न तजेगा, वह अपने निज भाग को न छोड़ेगा,
  15. 5परन्तु न्याय फिर धर्म के अनुसार किया जाएगा, और सारे सीधे मन वाले उसके पीछे पीछे हो लेंगे॥
  16. 6कुकर्मियों के विरुद्ध मेरी ओर कौन खड़ा होगा? मेरी ओर से अनर्थकारियों का कौन साम्हना करेगा?
  17. 7यदि यहोवा मेरा सहायक न होता, तो क्षण भर में मुझे चुपचाप होकर रहना पड़ता।
  18. 8जब मैं ने कहा, कि मेरा पांव फिसलने लगा है, तब हे यहोवा, तेरी करूणा ने मुझे थाम लिया।
  19. 9जब मेरे मन में बहुत सी चिन्ताएं होती हैं, तब हे यहोवा, तेरी दी हुई शान्ति से मुझ को सुख होता है।
  20. 0क्या तेरे और दुष्टों के सिंसाहन के बीच सन्धि होगी, जो कानून की आड़ में उत्पात मचाते हैं?
  21. 1वे धर्मी का प्राण लेने को दल बान्धते हैं, और निर्दोष को प्राणदण्ड देते हैं।
  22. 2परन्तु यहोवा मेरा गढ़, और मेरा परमेश्वर मेरी शरण की चट्टान ठहरा है।
  23. 3और उसने उनका अनर्थ काम उन्हीं पर लौटाया है, और वह उन्हें उन्हीं की बुराई के द्वारा सन्यानाश करेगा, हमारा परमेश्वर यहोवा उन को सत्यानाश करेगा॥

भजन संहित 95 ↟↟

  1. आओ हम यहोवा के लिये ऊंचे स्वर से गाएं, अपने उद्धार की चट्टान का जयजयकार करें.
  2. हम धन्यवाद करते हुए उसके सम्मुख आएं, और भजन गाते हुए उसका जयजयकार करें.
  3. क्योंकि यहोवा महान ईश्वर है, और सब देवताओं के ऊपर महान राजा है।
  4. पृथ्वी के गहिरे स्थान उसी के हाथ में हैं, और पहाड़ों की चोटियां भी उसी की हैं।
  5. समुद्र उसका है, और उसी ने उसको बनाया, और स्थल भी उसी के हाथ का रचा है॥
  6. आओ हम झुक कर दण्डवत करें, और अपने कर्ता यहोवा के साम्हने घुटने टेकें.
  7. क्योंकि वही हमारा परमेश्वर है, और हम उसकी चराई की प्रजा, और उसके हाथ की भेड़ें हैं॥ भला होता, कि आज तुम उसकी बात सुनते.
  8. अपना अपना हृदय ऐसा कठोर मत करो, जैसा मरीबा में, वा मस्सा के दिन जंगल में हुआ था,
  9. जब तुम्हारे पुरखाओं ने मुझे परखा, उन्होंने मुझ को जांचा और मेरे काम को भी देखा।
  10. 0चालीस वर्ष तक मैं उस पीढ़ी के लोगों से रूठा रहा, और मैं ने कहा, ये तो भरमाने वाले मन के हैं, और इन्होंने मेरे मार्गों को नहीं पहिचाना।
  11. 1इस कारण मैं ने क्रोध में आकर शपथ खाई कि ये मेरे विश्राम स्थान में कभी प्रवेश न करने पाएंगे॥

भजन संहित 96 ↟↟

  1. यहोवा के लिये एक नया गीत गाओ, हे सारी पृथ्वी के लोगों यहोवा के लिये गाओ.
  2. यहोवा के लिये गाओ, उसके नाम को धन्य कहो, दिन दिन उसके किए हुए उद्धार का शुभ समाचार सुनाते रहो।
  3. अन्य जातियों में उसकी महिमा का, और देश देश के लोगों में उसके आश्चर्यकर्मों का वर्णन करो।
  4. क्योंकि यहोवा महान और अति स्तुति के योग्य है, वह तो सब देवताओं से अधिक भय योग्य है।
  5. क्योंकि देश देश के सब देवता तो मूरतें ही हैं, परन्तु यहोवा ही ने स्वर्ग को बनाया है।
  6. उसके चारों और वैभव और ऐश्वर्य है, उसके पवित्र स्थान में सामर्थ्य और शोभा है।
  7. हे देश देश के कुलों, यहोवा का गुणानुवाद करो, यहोवा की महिमा और सामर्थ्य को मानो.
  8. यहोवा के नाम की ऐसी महिमा करो जो उसके योग्य है, भेंट ले कर उसके आंगनों में आओ.
  9. पवित्रता से शोभायमान होकर यहोवा को दण्डवत करो, हे सारी पृथ्वी के लोगों उसके साम्हने कांपते रहो.
  10. 0जाति जाति में कहो, यहोवा राजा हुआ है. और जगत ऐसा स्थिर है, कि वह टलने का नहीं, वह देश देश के लोगों का न्याय सीधाई से करेगा॥
  11. 1आकाश आनन्द करे, और पृथ्वी मगन हो, समुद्र और उस में की सब वस्तुएं गरज उठें,
  12. 2मैदान और जो कुछ उस में है, वह प्रफुल्लित हो, उसी समय वन के सारे वृक्ष जयजयकार करेंगे।
  13. 3यह यहोवा के साम्हने हो, क्योंकि वह आने वाला है। वह पृथ्वी का न्याय करने को आने वाला है, वह धर्म से जगत का, और सच्चाई से देश देश के लोगों का न्याय करेगा॥

भजन संहित 97 ↟↟

  1. यहोवा राजा हुआ है, पृथ्वी मगन हो, और द्वीप जो बहुतेरे हैं, वह भी आनन्द करें.
  2. बादल और अन्धकार उसके चारों ओर हैं, उसके सिंहासन का मूल धर्म और न्याय है।
  3. उसके आगे आगे आग चलती हुई उसके द्रोहियों को चारों ओर भस्म करती है।
  4. उसकी बिजलियों से जगत प्रकाशित हुआ, पृथ्वी देखकर थरथरा गई है.
  5. पहाड़ यहोवा के साम्हने, मोम की नाईं पिघल गए, अर्थात सारी पृथ्वी के परमेश्वर के साम्हने॥
  6. आकाश ने उसके धर्म की साक्षी दी, और देश देश के सब लोगों ने उसकी महिमा देखी है।
  7. जितने खुदी हुई मूर्तियों की उपासना करते और मूरतों पर फूलते हैं, वे लज्जित हों, हे सब देवताओं तुम उसी को दण्डवत करो।
  8. सिय्योन सुन कर आनन्दित हुई, और यहूदा की बेटियां मगन हुईं, हे यहोवा, यह तेरे नियमों के कारण हुआ।
  9. क्योंकि हे यहोवा, तू सारी पृथ्वी के ऊपर परमप्रधान है, तू सारे देवताओं से अधिक महान ठहरा है।
  10. 0हे यहोवा के प्रेमियों, बुराई से घृणा करो, वह अपने भक्तों के प्राणो की रक्षा करता, और उन्हें दुष्टों के हाथ से बचाता है।
  11. 1धर्मी के लिये ज्योति, और सीधे मन वालों के लिये आनन्द बोया गया है।
  12. 2हे धर्मियों यहोवा के कारण आनन्दित हो, और जिस पवित्र नाम से उसका स्मरण होता है, उसका धन्यवाद करो.

भजन संहित 98 ↟↟

  1. यहोवा के लिये एक नया गीत गाओ, क्योंकि उसने आश्चर्यकर्म किए है. उसके दाहिने हाथ और पवित्र भुजा ने उसके लिये उद्धार किया है.
  2. यहोवा ने अपना किया हुआ उद्धार प्रकाशित किया, उसने अन्यजातियों की दृष्टि में अपना धर्म प्रगट किया है।
  3. उसने इस्राएल के घराने पर की अपनी करूणा और सच्चाई की सुधि ली, और पृथ्वी के सब दूर दूर देशों ने हमारे परमेश्वर का किया हुआ उद्धार देखा है॥
  4. हे सारी पृथ्वी के लोगों यहोवा का जयजयकार करो, उत्साहपूर्वक जयजयकार करो, और भजन गाओ.
  5. वीणा बजा कर यहोवा का भजन गाओ, वीणा बजा कर भजन का स्वर सुनाओ।
  6. तुरहियां और नरसिंगे फूंक फूंककर यहोवा राजा का जयजयकार करो॥
  7. समुद्र और उस में की सब वस्तुएं गरज उठें, जगत और उसके निवासी महाशब्द करें.
  8. नदियां तालियां बजाएं, पहाड़ मिलकर जयजयकार करें।
  9. यह यहोवा के साम्हने हो, क्योंकि वह पृथ्वी का न्याय करने को आने वाला है। वह धर्म से जगत का, और सीधाई से देश देश के लोगों का न्याय करेगा॥

भजन संहित 99 ↟↟

  1. यहोवा राजा हुआ है, देश देश के लोग कांप उठें. वह करूबों पर विराजमान है, पृथ्वी डोल उठे.
  2. यहोवा सिय्योन में महान है, और वह देश देश के लोगों के ऊपर प्रधान है।
  3. वे तेरे महान और भययोग्य नाम का धन्यवाद करें. वह तो पवित्र है।
  4. राजा की सामर्थ्य न्याय से मेल रखती है, तू ही ने सीधाई को स्थापित किया, न्याय और धर्म को याकूब में तू ही ने चालू किया है।
  5. हमारे परमेश्वर यहोवा को सराहो, और उसके चरणों की चौकी के साम्हने दण्डवत करो. वह पवित्र है.
  6. उसके याजकों में मूसा और हारून, और उसके प्रार्थना करने वालों में से शमूएल यहोवा को पुकारते थे, और वह उनकी सुन लेता था।
  7. वह बादल के खम्भे में हो कर उन से बातें करता था, और वे उसकी चितौनियों और उसकी दी हुई विधियों पर चलते थे॥
  8. हे हमारे परमेश्वर यहोवा तू उनकी सुन लेता था, तू उनके कामों का पलटा तो लेता था तौभी उनके लिये क्षमा करने वाला ईश्वर था।
  9. हमारे परमेश्वर यहोवा को सराहो, और उसके पवित्र पर्वत पर दण्डवत करो, क्योंकि हमारा परमेश्वर यहोवा पवित्र है.

भजन संहित 100 ↟↟

  1. हे सारी पृथ्वी के लोगों यहोवा का जयजयकार करो.
  2. आनन्द से यहोवा की आराधना करो. जयजयकार के साथ उसके सम्मुख आओ.
  3. निश्चय जानो, कि यहोवा ही परमेश्वर है। उसी ने हम को बनाया, और हम उसी के हैं, हम उसकी प्रजा, और उसकी चराई की भेड़ें हैं॥
  4. उसके फाटकों से धन्यवाद, और उसके आंगनों में स्तुति करते हुए प्रवेश करो, उसका धन्यवाद करो, और उसके नाम को धन्य कहो.
  5. क्योंकि यहोवा भला है, उसकी करूणा सदा के लिये, और उसकी सच्चाई पीढ़ी से पीढ़ी तक बनी रहती है॥




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