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भजन संहित 126 ↟↟

  1. जब यहोवा सिय्योन से लौटने वालों को लौटा ले आया, तब हम स्वप्न देखने वाले से हो गए।
  2. तब हम आनन्द से हंसने और जयजयकार करने लगे, तब जाति जाति के बीच में कहा जाता था, कि यहोवा ने, इनके साथ बड़े बड़े काम किए हैं।
  3. यहोवा ने हमारे साथ बड़े बड़े काम किए हैं, और इस से हम आनन्दित हैं॥
  4. हे यहोवा, दक्खिन देश के नालों की नाईं, हमारे बन्धुओं को लौटा ले आ.
  5. जो आंसू बहाते हुए बोते हैं, वे जयजयकार करते हुए लवने पाएंगे।
  6. चाहे बोने वाला बीज ले कर रोता हुआ चला जाए, परन्तु वह फिर पूलियां लिए जयजयकार करता हुआ निश्चय लौट आएगा॥

भजन संहित 127 ↟↟

  1. यदि घर को यहोवा न बनाए, तो उसके बनाने वालों को परिश्रम व्यर्थ होगा। यदि नगर की रक्षा यहोवा न करे, तो रखवाले का जागना व्यर्थ ही होगा।
  2. तुम जो सवेरे उठते और देर करके विश्राम करते और दु:ख भरी रोटी खाते हो, यह सब तुम्हारे लिये व्यर्थ ही है, क्योंकि वह अपने प्रियों को यों ही नींद दान करता है॥
  3. देखे, लड़के यहोवा के दिए हुए भाग हैं, गर्भ का फल उसकी ओर से प्रतिफल है।
  4. जैसे वीर के हाथ में तीर, वैसे ही जवानी के लड़के होते हैं।
  5. क्या ही धन्य है वह पुरूष जिसने अपने तर्कश को उन से भर लिया हो. वह फाटक के पास शत्रुओं से बातें करते संकोच न करेगा॥

भजन संहित 128 ↟↟

  1. क्या ही धन्य है हर एक जो यहोवा का भय मानता है, और उसके मार्गों पर चलता है.
  2. तू अपनी कमाई को निश्चय खाने पाएगा, तू धन्य होगा, और तेरा भला ही होगा॥
  3. तेरे घर के भीतर तेरी स्त्री फलवन्त दाखलता सी होगी, तेरी मेज के चारों ओर तेरे बालक जलपाई के पौधे से होंगे।
  4. सुन, जो पुरूष यहोवा का भय मानता हो, वह ऐसी ही आशीष पाएगा॥
  5. यहोवा तुझे सिय्योन से आशीष देवे, और तू जीवन भर यरूशलेम का कुशल देखता रहे.
  6. वरन तू अपने नाती- पोतों को भी देखने पाए. इस्राएल को शान्ति मिले.

भजन संहित 129 ↟↟

  1. इस्राएल अब यह कहे, कि मेरे बचपन से लोग मुझे बार बार क्लेश देते आए हैं,
  2. मेरे बचपन से वे मुझ को बार बार क्लेश देते तो आए हैं, परन्तु मुझ पर प्रबल नहीं हुए।
  3. हलवाहों ने मेरी पीठ के ऊपर हल चलाया, और लम्बी लम्बी रेखाएं कीं।
  4. यहोवा धर्मी है, उसने दुष्टों के फन्दों को काट डाला है।
  5. जितने सिय्योन से बैर रखते हैं, उन सभों की आशा टूटे, ओर उन को पीछे हटना पड़े.
  6. वे छत पर की घास के समान हों, जो बढ़ने से पहिले सूख जाती है,
  7. जिस से कोई लवैया अपनी मुट्ठी नहीं भरता, न पूलियों का कोई बान्धने वाला अपनी अंकवार भर पाता है,
  8. और न आने जाने वाले यह कहते हैं, कि यहोवा की आशीष तुम पर होवे. हम तुम को यहोवा के नाम से आशीर्वाद देते हैं.

भजन संहित 130 ↟↟

  1. हे यहोवा, मैं ने गहिरे स्थानों में से तुझ को पुकारा है.
  2. हे प्रभु, मेरी सुन. तेरे कान मेरे गिड़गिड़ाने की ओर ध्यान से लगे रहें.
  3. हे याह, यदि तू अधर्म के कामों का लेखा ले, तो हे प्रभु कौन खड़ा रह सकेगा?
  4. परन्तु तू क्षमा करने वाला है? जिस से तेरा भय माना जाए।
  5. मैं यहोवा की बाट जोहता हूं, मैं जी से उसकी बाट जोहता हूं, और मेरी आशा उसके वचन पर है,
  6. पहरूए जितना भोर को चाहते हैं, हां, पहरूए जितना भोर को चाहते हैं, उससे भी अधिक मैं यहोवा को अपने प्राणों से चाहता हूं॥
  7. इस्राएल यहोवा पर आशा लगाए रहे. क्योंकि यहोवा करूणा करने वाला और पूरा छुटकारा देने वाला है।
  8. इस्राएल को उसके सारे अधर्म के कामों से वही छुटकारा देगा॥

भजन संहित 131 ↟↟

  1. हे यहोवा, न तो मेरा मन गर्व से और न मेरी दृष्टि घमण्ड से भरी है, और जो बातें बड़ी और मेरे लिये अधिक कठिन हैं, उन से मैं काम नहीं रखता।
  2. निश्चय मैं ने अपने मन को शान्त और चुप कर दिया है, जैसे दूध छुड़ाया हुआ लड़का अपनी मां की गोद में रहता है, वैसे ही दूध छुड़ाए हुए लड़के के समान मेरा मन भी रहता है॥
  3. हे इस्राएल, अब से लेकर सदा सर्वदा यहोवा ही पर आशा लगाए रह.

भजन संहित 132 ↟↟

  1. हे यहोवा, दाऊद के लिये उसकी सारी दुर्दशा को स्मरण कर,
  2. उसने यहोवा से शपथ खाई, और याकूब के सर्वशक्तिमान की मन्नत मानी है,
  3. कि निश्चय मैं उस समय तक अपने घर में प्रवेश न करूंगा, और ने अपने पलंग पर चढूंगा,
  4. न अपनी आंखों में नींद, और न अपनी पलकों में झपकी आने दूंगा,
  5. जब तक मैं यहोवा के लिये एक स्थान, अर्थात याकूब के सर्वशक्तिमान के लिये निवास स्थान न पाऊं॥
  6. देखो, हम ने एप्राता में इसकी चर्चा सुनी है, हम ने इस को वन के खेतों में पाया है।
  7. आओ, हम उसके निवास में प्रवेश करें, हम उसके चरणों की चौकी के आगे दण्डवत करें.
  8. हे यहोवा, उठकर अपने विश्रामस्थान में अपनी सामर्थ्य के सन्दूक समेत आ।
  9. तेरे याजक धर्म के वस्त्र पहिने रहें, और तेरे भक्त लोग जयजयकार करें।
  10. 0अपने दास दाऊद के लिये अपने अभिषिक्त की प्रार्थना की अनसुनी न कर॥
  11. 1यहोवा ने दाऊद से सच्ची शपथ खाई है और वह उससे न मुकरेगा: कि मैं तेरी गद्दी पर तेरे एक निज पुत्र को बैठाऊंगा।
  12. 2यदि तेरे वंश के लोग मेरी वाचा का पालन करें और जो चितौनी मैं उन्हें सिखाऊंगा, उस पर चलें, तो उनके वंश के लोग भी तेरी गद्दी पर युग युग बैठते चले जाएंगे।
  13. 3क्योंकि यहोवा ने सिय्योन को अपनाया है, और उसे अपने निवास के लिये चाहा है॥
  14. 4यह तो युग युग के लिये मेरा विश्रामस्थान हैं, यहीं मैं रहूंगा, क्योंकि मैं ने इसको चाहा है।
  15. 5मैं इस में की भोजन वस्तुओं पर अति आशीष दूंगा, और इसके दरिद्रों को रोटी से तृप्त करूंगा।
  16. 6इसके याजकों को मैं उद्धार का वस्त्र पहिनाऊंगा, और इसके भक्त लोग ऊंचे स्वर से जयजयकार करेंगे।
  17. 7वहां मैं दाऊद के एक सींग उगाऊंगा, मैं ने अपने अभिषिक्त के लिये एक दीपक तैयार कर रखा है।
  18. 8मैं उसके शत्रुओं को तो लज्जा का वस्त्र पहिनाऊंगा, परन्तु उस के सिर पर उसका मुकुट शोभायमान रहेगा॥

भजन संहित 133 ↟↟

  1. देखो, यह क्या ही भली और मनोहर बात है कि भाई लोग आपस में मिले रहें.
  2. यह तो उस उत्तम तेल के समान है, जो हारून के सिर पर डाला गया था, और उसकी दाढ़ी पर बह कर, उसके वस्त्र की छोर तक पहुंच गया।
  3. वह हेर्मोन की उस ओस के समान है, जो सिय्योन के पहाड़ों पर गिरती है. यहोवा ने तो वहीं सदा के जीवन की आशीष ठहराई है॥

भजन संहित 134 ↟↟

  1. हे यहोवा के सब सेवकों, सुनो, तुम जो रात रात को यहोवा के भवन में खड़े रहते हो, यहोवा को धन्य कहो।
  2. अपने हाथ पवित्र स्थान में उठा कर, यहोवा को धन्य कहो।
  3. यहोवा जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है, वह सिय्योन में से तुझे आशीष देवे॥

भजन संहित 135 ↟↟

  1. याह की स्तुति करो, यहोवा के नाम की स्तुति करो, हे यहोवा के सेवकों तुम स्तुति करो,
  2. तुम जो यहोवा के भवन में, अर्थात हमारे परमेश्वर के भवन के आंगनों में खड़े रहते हो.
  3. याह की स्तुति करो, क्योंकि यहोवा भला है, उसके नाम का भजन गाओ, क्योंकि यह मन भाऊ है.
  4. याह ने तो याकूब को अपने लिये चुना है, अर्थात इस्राएल को अपने निज धन होने के लिये चुन लिया है।
  5. मैं तो जानता हूं कि हमारा प्रभु यहोवा सब देवताओं से महान है।
  6. जो कुछ यहोवा ने चाहा उसे उसने आकाश और पृथ्वी और समुद्र और सब गहिरे स्थानों में किया है।
  7. वह पृथ्वी की छोर से कुहरे उठाता है, और वर्षा के लिये बिजली बनाता है, और पवन को अपने भण्डार में से निकालता है।
  8. उसने मिस्त्र में क्या मनुष्य क्या पशु, सब के पहिलौठों को मार डाला.
  9. हे मिस्त्र, उसने तेरे बीच में फिरौन और उसके सब कर्मचारियों के बीच चिन्ह और चमत्कार किए।
  10. 0उसने बहुत सी जातियां नाश की, और सामर्थी राजाओं को,
  11. 1अर्थात एमोरियों के राजा सीहोन को, और बाशान के राजा ओग को, और कनान के सब राजाओं को घात किया,
  12. 2और उनके देश को बांट कर, अपनी प्रजा इस्राएल के भाग होने के लिये दे दिया॥
  13. 3हे यहोवा, तेरा नाम सदा स्थिर है, हे यहोवा जिस नाम से तेरा स्मरण होता है, वह पीढ़ी- पीढ़ी बना रहेगा।
  14. 4यहोवा तो अपनी प्रजा का न्याय चुकाएगा, और अपने दासों की दुर्दशा देख कर तरस खाएगा।
  15. 5अन्यजातियों की मूरतें सोना- चान्दी ही हैं, वे मनुष्यों की बनाईं हुई हैं।
  16. 6उनके मुंह तो रहता है, परन्तु वे बोल नहीं सकतीं, उनके आंखें तो रहती हैं, परन्तु वे देख नहीं सकतीं,
  17. 7उनके कान तो रहते हैं, परन्तु वे सुन नहीं सकतीं, न उनके कुछ भी सांस चलती है।
  18. 8जैसी वे हैं वैसे ही उनके बनाने वाले भी हैं, और उन पर सब भरोसा रखने वाले भी वैसे ही हो जाएंगे.
  19. 9हे इस्राएल के घराने यहोवा को धन्य कह. हे हारून के घराने यहोवा को धन्य कह.
  20. 0हे लेवी के घराने यहोवा को धन्य कह. हे यहोवा के डरवैयो यहोवा को धन्य कहो.
  21. 1यहोवा जो यरूशलेम में वास करता है, उसे सिय्योन में धन्य कहा जावे. याह की स्तुति करो.

भजन संहित 136 ↟↟

  1. यहोवा का धन्यवाद करो, क्योंकि वह भला है, और उसकी करूणा सदा की है।
  2. जो ईश्वरों का परमेश्वर है, उसका धन्यवाद करो, उसकी करूणा सदा की है।
  3. जो प्रभुओं का प्रभु है, उसका धन्यवाद करो, उसकी करूणा सदा की है॥
  4. उसको छोड़कर कोई बड़े बड़े अशचर्यकर्म नहीं करता, उसकी करूणा सदा की है।
  5. उसने अपनी बुद्धि से आकाश बनाया, उसकी करूणा सदा की है।
  6. उसने पृथ्वी को जल के ऊपर फैलाया है, उसकी करूणा सदा की है।
  7. उसने बड़ी बड़ी ज्योतियों बनाईं, उसकी करूणा सदा की है।
  8. दिन पर प्रभुता करने के लिये सूर्य को बनाया, उसकी करूणा सदा की है।
  9. और रात पर प्रभुता करने के लिये चन्द्रमा और तारागण को बनाया, उसकी करूणा सदा की है।
  10. 0उसने मिस्त्रियों के पहिलौठों को मारा, उसकी करूणा सदा की है॥
  11. 1और उनके बीच से इस्राएलियों को निकाला, उसकी करूणा सदा की है।
  12. 2बलवन्त हाथ और बढ़ाई हुई भुजा से निकाल लाया, उसकी करूणा सदा की है।
  13. 3उसने लाल समुद्र को खण्ड खण्ड कर दिया, उसकी करूणा सदा की है।
  14. 4और इस्राएल को उसके बीच से पार कर दिया, उसकी करूणा सदा की है।
  15. 5और फिरौन को सेना समेत लाल समुद्र में डाल दिया, उसकी करूणा सदा की है।
  16. 6वह अपनी प्रजा को जंगल में ले चला, उसकी करूणा सदा की है।
  17. 7उसने बड़े बड़े राजा मारे, उसकी करूणा सदा की है।
  18. 8उसने प्रतापी राजाओं को भी मारा, उसकी करूणा सदा की है।
  19. 9एमोरियों के राजा सीहोन को, उसकी करूणा सदा की है।
  20. 0और बाशान के राजा ओग को घात किया, उसकी करूणा सदा की है।
  21. 1और उनके देश को भाग होने के लिये, उसकी करूणा सदा की है।
  22. 2अपने दास इस्राएलियों के भाग होने के लिये दे दिया, उसकी करूणा सदा की है।
  23. 3उसने हमारी दुर्दशा में हमारी सुधि ली, उसकी करूणा सदा की है।
  24. 4और हम को द्रोहियों से छुड़ाया है, उसकी करूणा सदा की है।
  25. 5वह सब प्राणियों को आहार देता है, उसकी करूणा सदा की है।
  26. 6स्वर्ग के परमेश्वर का धन्यवाद करो, उसकी करूणा सदा की है।

भजन संहित 137 ↟↟

  1. बाबुल की नहरों के किनारे हम लोग बैठ गए, और सिय्योन को स्मरण करके रो पड़े.
  2. उसके बीच के मजनू वर्क्षों पर हम ने अपनी वीणाओं को टांग दिया,
  3. क्योंकि जो हम को बन्धुए करके ले गए थे, उन्होंने वहां हम से गीत गवाना चाहा, और हमारे रूलाने वालों ने हम से आनन्द चाह कर कहा, सिय्योन के गीतों में से हमारे लिये कोई गीत गाओ.
  4. हम यहोवा के गीत को, पराए देश में क्योंकर गाएं?
  5. हे यरूशलेम, यदि मैं तुझे भूल जाऊं, तो मेरा दहिना हाथ झूठा हो जाए.
  6. यदि मैं तुझे स्मरण न रखूं, यदि मैं यरूशलेम को अपने सब आनन्द से श्रेष्ठ न जानूं, तो मेरी जीभ तालू से चिपट जाए.
  7. हे यहोवा, यरूशलेम के दिन को एदोमियों के विरुद्ध स्मरण कर, कि वे क्योंकर कहते थे, ढाओ. उसको नेव से ढा दो।
  8. हे बाबुल तू जो उजड़ने वाली है, क्या ही धन्य वह होगा, जो तुझ से ऐसा बर्ताव करेगा जैसा तू ने हम से किया है.
  9. क्या ही धन्य वह होगा, जो तेरे बच्चों को पकड़ कर, चट्टान पर पटक देगा.

भजन संहित 138 ↟↟

  1. मैं पूरे मन से तेरा धन्यवाद करूँगा, देवताओं के सामने भी मैं तेरा भजन गाऊँगा।
  2. मैं तेरे पवित्र मन्दिर की ओर दण्डवत करूँगा, और तेरी करुणा और सच्चाई के कारण तेरे नाम का धन्यवाद करूँगा, क्योंकि तू ने अपने वचन को अपने बड़े नाम से अधिक महत्त्व दिया है।
  3. जिस दिन मैंने पुकारा, उसी दिन तू ने मेरी सुन ली, और मुझ में बल दे कर मुझे हियाव बन्धाया।
  4. हे यहोवा, पृथ्वी के सब राजा तेरा धन्यवाद करेंगे, क्योंकि उन्होंने तेरे वचन सुने हैं,
  5. और वे यहोवा की गति के विषय में गाएंगे, क्योंकि यहोवा की महिमा बड़ी है।
  6. यद्यपि यहोवा महान है, तौभी वह नम्र मनुष्य की ओर दृष्टि करता है, परन्तु अहंकारी को दूर ही से पहिचानता है।
  7. चाहे मैं संकट के बीच में रहूं तौभी तू मुझे जिलाएगा, तू मेरे क्रोधित शत्रुओं के विरुद्ध हाथ बढ़ाएगा, और अपने दाहिने हाथ से मेरा उद्धार करेगा।
  8. यहोवा मेरे लिये सब कुछ पूरा करेगा, हे यहोवा तेरी करुणा सदा की है। तू अपने हाथों के कार्यों को त्याग न दे।

भजन संहित 139 ↟↟

  1. हे यहोवा, तू ने मुझे जांच कर जान लिया है॥
  2. तू मेरा उठना बैठना जानता है, और मेरे विचारों को दूर ही से समझ लेता है।
  3. मेरे चलने और लेटने की तू भली भांति छानबीन करता है, और मेरी पूरी चालचलन का भेद जानता है।
  4. हे यहोवा, मेरे मुंह में ऐसी कोई बात नहीं जिसे तू पूरी रीति से न जानता हो।
  5. तू ने मुझे आगे पीछे घेर रखा है, और अपना हाथ मुझ पर रखे रहता है।
  6. यह ज्ञान मेरे लिये बहुत कठिन है, यह गम्भीर और मेरी समझ से बाहर है॥
  7. मैं तेरे आत्मा से भाग कर किधर जाऊं? वा तेरे साम्हने से किधर भागूं?
  8. यदि मैं आकाश पर चढूं, तो तू वहां है. यदि मैं अपना बिछौना अधोलोक में बिछाऊं तो वहां भी तू है.
  9. यदि मैं भोर की किरणों पर चढ़ कर समुद्र के पार जा बसूं,
  10. 0तो वहां भी तू अपने हाथ से मेरी अगुवाई करेगा, और अपने दाहिने हाथ से मुझे पकड़े रहेगा।
  11. 1यदि मैं कहूं कि अन्धकार में तो मैं छिप जाऊंगा, और मेरे चारों ओर का उजियाला रात का अन्धेरा हो जाएगा,
  12. 2तौभी अन्धकार तुझ से न छिपाएगा, रात तो दिन के तुल्य प्रकाश देगी, क्योंकि तेरे लिये अन्धियारा और उजियाला दोनों एक समान हैं॥
  13. 3मेरे मन का स्वामी तो तू है, तू ने मुझे माता के गर्भ में रचा।
  14. 4मैं तेरा धन्यवाद करूंगा, इसलिये कि मैं भयानक और अद्भुत रीति से रचा गया हूं। तेरे काम तो आश्चर्य के हैं, और मैं इसे भली भांति जानता हूं।
  15. 5जब मैं गुप्त में बनाया जाता, और पृथ्वी के नीचे स्थानों में रचा जाता था, तब मेरी हडि्डयां तुझ से छिपी न थीं।
  16. 6तेरी आंखों ने मेरे बेडौल तत्व को देखा, और मेरे सब अंग जो दिन दिन बनते जाते थे वे रचे जाने से पहिले तेरी पुस्तक में लिखे हुए थे।
  17. 7और मेरे लिये तो हे ईश्वर, तेरे विचार क्या ही बहुमूल्य हैं. उनकी संख्या का जोड़ कैसा बड़ा है॥
  18. 8यदि मैं उन को गिनता तो वे बालू के किनकों से भी अधिक ठहरते। जब मैं जाग उठता हूं, तब भी तेरे संग रहता हूं॥
  19. 9हे ईश्वर निश्चय तू दुष्ट को घात करेगा. हे हत्यारों, मुझ से दूर हो जाओ।
  20. 0क्योंकि वे तेरी चर्चा चतुराई से करते हैं, तेरे द्रोही तेरा नाम झूठी बात पर लेते हैं।
  21. 1हे यहोवा, क्या मैं तेरे बैरियों से बैर न रखूं, और तेरे विरोधियों से रूठ न जाऊं?
  22. 2हां, मैं उन से पूर्ण बैर रखता हूं, मैं उन को अपना शत्रु समझता हूं।
  23. 3हे ईश्वर, मुझे जांच कर जान ले. मुझे परख कर मेरी चिन्ताओं को जान ले.
  24. 4और देख कि मुझ में कोई बुरी चाल है कि नहीं, और अनन्त के मार्ग में मेरी अगुवाई कर.

भजन संहित 140 ↟↟

  1. हे यहोवा, मुझ को बुरे मनुष्य से बचा ले, उपद्रवी पुरूष से मेरी रक्षा कर,
  2. क्योंकि उन्होंने मन में बुरी कल्पनाएं की हैं, वे लगातार लड़ाइयां मचाते हैं।
  3. उनका बोलना सांप का काटना सा है, उनके मुंह में नाग का सा विष रहता है॥
  4. हे यहोवा, मुझे दुष्ट के हाथों से बचा ले, उपद्रवी पुरूष से मेरी रक्षा कर, क्योंकि उन्होंने मेरे पैरों के उखाड़ने की युक्ति की है।
  5. घमण्डियों ने मेरे लिये फन्दा और पासे लगाए, और पथ के किनारे जाल बिछाया है, उन्होंने मेरे लिये फन्दे लगा रखे हैं॥
  6. हे यहोवा, मैं ने तुझ से कहा है कि तू मेरा ईश्वर है, हे यहोवा, मेरे गिड़गड़ाने की ओर कान लगा.
  7. हे यहोवा प्रभु, हे मेरे सामर्थी उद्धारकर्ता, तू ने युद्ध के दिन मेरे सिर की रक्षा की है।
  8. हे यहोवा दुष्ट की इच्छा को पूरी न होने दे, उसकी बुरी युक्ति को सफल न कर, नहीं तो वह घमण्ड करेगा॥
  9. मेरे घेरने वालों के सिर पर उन्हीं का विचारा हुआ उत्पात पड़े.
  10. 0उन पर अंगारे डाले जाएं. वे आग में गिरा दिए जाएं. और ऐसे गड़हों में गिरें, कि वे फिर उठ न सकें.
  11. 1बकवादी पृथ्वी पर स्थिर नहीं होने का, उपद्रवी पुरूष को गिराने के लिये बुराई उसका पीछा करेगी॥
  12. 2हे यहोवा, मुझे निश्चय है कि तू दीन जन का और दरिद्रों का न्याय चुकाएगा।
  13. 3नि:सन्देह धर्मी तेरे नाम का धन्यवाद करने पाएंगे, सीधे लोग तेरे सम्मुख वास करेंगे॥

भजन संहित 141 ↟↟

  1. हे यहोवा, मैं ने तुझे पुकारा है, मेरे लिये फुर्ती कर. जब मैं तुझ को पुकारूं, तब मेरी ओर कान लगा.
  2. मेरी प्रार्थना तेरे साम्हने सुगन्ध धूप, और मेरा हाथ फैलाना, संध्या काल का अन्नबलि ठहरे.
  3. हे यहोवा, मेरे मुख का पहरा बैठा, मेरे हाठों के द्वार पर रखवाली कर.
  4. मेरा मन किसी बुरी बात की ओर फिरने न दे, मैं अनर्थकारी पुरूषों के संग, दुष्ट कामों में न लगूं, और मैं उनके स्वादिष्ट भोजन वस्तुओं में से कुछ न खाऊं.
  5. धर्मी मुझ को मारे तो यह कृपा मानी जाएगी, और वह मुझे ताड़ना दे, तो यह मेरे सिर पर का तेल ठहरेगा, मेरा सिर उस से इन्कार न करेगा॥ लोगों के बुरे काम करने पर भी मैं प्रार्थना में लवलीन रहूंगा।
  6. जब उनके न्यायी चट्टान के पास गिराए गए, तब उन्होंने मेरे वचन सुन लिए, क्योंकि वे मधुर हैं।
  7. जैसे भूमि में हल चलने से ढेले फूटते हैं, वैसे ही हमारी हडि्डयां अधोलोक के मुंह पर छितराई हुई हैं॥
  8. परन्तु हे यहोवा, प्रभु, मेरी आंखे तेरी ही ओर लगी हैं, मैं तेरा शरणागत हूं, तू मेरे प्राण जाने न दे.
  9. मुझे उस फन्दे से, जो उन्होंने मेरे लिये लगाया है, और अनर्थकारियों के जाल से मेरी रक्षा कर.
  10. 0दुष्ट लोग अपने जालों में आप ही फंसें, और मैं बच निकलूं॥

भजन संहित 142 ↟↟

  1. ममैं यहोवा की दोहाई देता, मैं यहोवा से गिड़गिड़ाता हूं,
  2. मैं अपने शोक की बातें उस से खोलकर कहता, मैं अपना संकट उस के आगे प्रगट करता हूं।
  3. जब मेरी आत्मा मेरे भीतर से व्याकुल हो रही थी, तब तू मेरी दशा को जानता था. जिस रास्ते से मैं जाने वाला था, उसी में उन्होंने मेरे लिये फन्दा लगाया।
  4. मैं ने दाहिनी ओर देखा, परन्तु कोई मुझे नहीं देखता है। मेरे लिये शरण कहीं नहीं रही, न मुझ को कोई पूछता है॥
  5. हे यहोवा, मैं ने तेरी दोहाई दी है, मैं ने कहा, तू मेरा शरणस्थान है, मेरे जीते जी तू मेरा भाग है।
  6. मेरी चिल्लाहट को ध्यान देकर सुन, क्योंकि मेरी बड़ी दुर्दशा हो गई है. जो मेरे पीछे पड़े हैं, उन से मुझे बचा ले, क्योंकि वे मुझ से अधिक सामर्थी हैं।
  7. मुझ को बन्दीगृह से निकाल कि मैं तेरे नाम का धन्यवाद करूं. धर्मी लोग मेरे चारों ओर आएंगे, क्योंकि तू मेरा उपकार करेगा॥

भजन संहित 143 ↟↟

  1. हे यहोवा मेरी प्रार्थना सुन, मेरे गिड़गिड़ाने की ओर कान लगा. तू जो सच्चा और धर्मी है, सो मेरी सुन ले,
  2. और अपने दास से मुकद्दमा न चला. क्योंकि कोई प्राणी तेरी दृष्टि में निर्दोष नहीं ठहर सकता॥
  3. शत्रु तो मेरे प्राण का ग्राहक हुआ है, उसने मुझे चूर कर के मिट्टी में मिलाया है, और मुझे ढेर दिन के मरे हुओं के समान अन्धेरे स्थान में डाल दिया है।
  4. मेरी आत्मा भीतर से व्याकुल हो रही है मेरा मन विकल है॥
  5. मुझे प्राचीन काल के दिन स्मरण आते हैं, मैं तेरे सब अद्भुत कामों पर ध्यान करता हूं, और तेरे काम को सोचता हूं।
  6. मैं तेरी ओर अपने हाथ फैलाए हूए हूं, सूखी भूमि की नाईं मैं तेरा प्यासा हूं॥
  7. हे यहोवा, फुर्ती कर के मेरी सुन ले, क्योंकि मेरे प्राण निकलने ही पर हैं मुझ से अपना मुंह न छिपा, ऐसा न हो कि मैं कबर में पड़े हुओं के समान हो जाऊं।
  8. अपनी करूणा की बात मुझे शीघ्र सुना, क्योंकि मैं ने तुझी पर भरोसा रखा है। जिस मार्ग से मुझे चलना है, वह मुझ को बता दे, क्योंकि मैं अपना मन तेरी ही ओर लगाता हूं॥
  9. हे यहोवा, मुझे शत्रुओं से बचा ले, मैं तेरी ही आड़ में आ छिपा हूं।
  10. 0मुझ को यह सिखा, कि मैं तेरी इच्छा क्योंकर पूरी करूं, क्योंकि मेरा परमेश्वर तू ही है. तेरा भला आत्मा मुझ को धर्म के मार्ग में ले चले.
  11. 1हे यहोवा, मुझे अपने नाम के निमित्त जिला. तू जो धर्मी है, मुझ को संकट से छुड़ा ले.
  12. 2और करूणा करके मेरे शत्रुओं को सत्यानाश कर, और मेरे सब सताने वालों का नाश कर डाल, क्योंकि मैं तेरा दास हूं॥

भजन संहित 144 ↟↟

  1. धन्य है यहोवा, जो मेरी चट्टान है, वह मेरे हाथों को लड़ने, और युद्ध करने के लिये तैयार करता है।
  2. वह मेरे लिये करूणानिधान और गढ़, ऊंचा स्थान और छुड़ाने वाला है, वह मेरी ढ़ाल और शरण स्थान है, जो मेरी प्रजा को मेरे वश में कर देता है॥
  3. हे यहोवा, मनुष्य क्या है कि तू उसकी सुधि लेता है, या आदमी क्या है, कि तू उसकी कुछ चिन्ता करता है?
  4. मनुष्य तो सांस के समान है, उसके दिन ढलती हुई छाया के समान हैं॥
  5. हे यहोवा, अपने स्वर्ग को नीचा करके उतर आ. पहाड़ों को छू तब उन से धुंआं उठेगा.
  6. बिजली कड़का कर उन को तितर बितर कर दे, अपने तीर चला कर उन को घबरा दे.
  7. अपने हाथ ऊपर से बढ़ा कर मुझे महासागर से उबार, अर्थात परदेशियों के वश से छुड़ा।
  8. उनके मुंह से तो व्यर्थ बातें निकलती हैं, और उनके दाहिने हाथ से धोखे के काम होते हैं॥
  9. हे परमेश्वर, मैं तेरी स्तुति का नया गीत गाऊंगा, मैं दस तार वाली सारंगी बजा कर तेरा भजन गाऊंगा।
  10. 0तू राजाओं का उद्धार करता है, और अपने दास दाऊद को तलवार की मार से बचाता है।
  11. 1तू मुझ को उबार और परदेशियों के वश से छुड़ा ले, जिन के मुंह से व्यर्थ बातें निकलती हैं, और जिनका दाहिना हाथ झूठ का दाहिना हाथ है॥
  12. 2जब हमारे बेटे जवानी के समय पौधों की नाईं बढ़े हुए हों, और हमारी बेटियां उन कोने वाले पत्थरों के समान हों, जो मन्दिर के पत्थरों की नाईं बनाए जाएं,
  13. 3जब हमारे खत्ते भरे रहें, और उन में भांति भांति का अन्न धरा जाए, और हमारी भेड़- बकरियां हमारे मैदानों में हजारों हजार बच्चे जनें,
  14. 4जब हमारे बैल खूब लदे हुए हों, जब हमें न विघ्न हो और न हमारा कहीं जाना हो, और न हमारे चौकों में रोना- पीटना हो,
  15. 5तो इस दशा में जो राज्य हो वह क्या ही धन्य होगा. जिस राज्य का परमेश्वर यहोवा है, वह क्या ही धन्य है.

भजन संहित 145 ↟↟

  1. हे मेरे परमेश्वर, हे राजा, मैं तुझे सराहूंगा, और तेरे नाम को सदा सर्वदा धन्य कहता रहूंगा।
  2. प्रति दिन मैं तुझ को धन्य कहा करूंगा, और तेरे नाम की स्तुति सदा सर्वदा करता रहूंगा।
  3. यहोवा महान और अति स्तुति के योग्य है, और उसकी बड़ाई अगम है॥
  4. तेरे कामों की प्रशंसा और तेरे पराक्रम के कामों का वर्णन, पीढ़ी पीढ़ी होता चला जाएगा।
  5. मैं तेरे ऐश्वर्य की महिमा के प्रताप पर और तेरे भांति भांति के आश्चर्यकर्मों पर ध्यान करूंगा।
  6. लोग तेरे भयानक कामों की शक्ति की चर्चा करेंगे, और मैं तेरे बड़े बड़े कामों का वर्णन करूंगा।
  7. लोग तेरी बड़ी भलाई का स्मरण करके उसकी चर्चा करेंगे, और तेरे धर्म का जयजयकार करेंगे॥
  8. यहोवा अनुग्रहकारी और दयालु, विलम्ब से क्रोध करने वाला और अति करूणामय है।
  9. यहोवा सभों के लिये भला है, और उसकी दया उसकी सारी सृष्टि पर है॥
  10. 0हे यहोवा, तेरी सारी सृष्टि तेरा धन्यवाद करेगी, और तेरे भक्त लोग तुझे धन्य कहा करेंगे.
  11. 1वे तेरे राज्य की महिमा की चर्चा करेंगे, और तेरे पराक्रम के विषय में बातें करेंगे,
  12. 2कि वे आदमियों पर तेरे पराक्रम के काम और तेरे राज्य के प्रताप की महिमा प्रगट करें।
  13. 3तेरा राज्य युग युग का और तेरी प्रभुता सब पीढ़ियों तक बनी रहेगी॥
  14. 4यहोवा सब गिरते हुओं को संभालता है, और सब झुके हुओं को सीधा खड़ा करता है।
  15. 5सभों की आंखें तेरी ओर लगी रहती हैं, और तू उन को आहार समय पर देता है।
  16. 6तू अपनी मुट्ठी खोल कर, सब प्राणियों को आहार से तृप्त करता है।
  17. 7यहोवा अपनी सब गति में धर्मी और अपने सब कामों में करूणामय है।
  18. 8जितने यहोवा को पुकारते हैं, अर्थात जितने उसको सच्चाई से पुकारते हें, उन सभों के वह निकट रहता है।
  19. 9वह अपने डरवैयों की इच्छा पूरी करता है, ओर उनकी दोहाई सुन कर उनका उद्धार करता है।
  20. 0यहोवा अपने सब प्रेमियों की तो रक्षा करता, परन्तु सब दुष्टों को सत्यानाश करता है॥
  21. 1मैं यहोवा की स्तुति करूंगा, और सारे प्राणी उसके पवित्र नाम को सदा सर्वदा धन्य कहते रहें॥

भजन संहित 146 ↟↟

  1. याह की स्तुति करो। हे मेरे मन यहोवा की स्तुति कर.
  2. मैं जीवन भर यहोवा की स्तुति करता रहूंगा, जब तक मैं बना रहूंगा, तब तक मैं अपने परमेश्वर का भजन गाता रहूंगा॥
  3. तुम प्रधानों पर भरोसा न रखना, न किसी आदमी पर, क्योंकि उस में उद्धार करने की भी शक्ति नहीं।
  4. उसका भी प्राण निकलेगा, वही भी मिट्टी में मिल जाएगा, उसी दिन उसकी सब कल्पनाएं नाश हो जाएंगी॥
  5. क्या ही धन्य वह है, जिसका सहायक याकूब का ईश्वर है, और जिसका भरोसा अपने परमेश्वर यहोवा पर है।
  6. वह आकाश और पृथ्वी और समुद्र और उन में जो कुछ है, सब का कर्ता है, और वह अपना वचन सदा के लिये पूरा करता रहेगा।
  7. वह पिसे हुओं का न्याय चुकाता है, और भूखों को रोटी देता है॥ यहोवा बन्धुओं को छुड़ाता है,
  8. यहोवा अन्धों को आंखें देता है। यहोवा झुके हुओं को सीधा खड़ा करता है, यहोवा धर्मियों से प्रेम रखता है।
  9. यहोवा परदेशियों की रक्षा करता है, और अनाथों और विधवा को तो सम्भालता है, परन्तु दुष्टों के मार्ग को टेढ़ा मेढ़ा करता है॥
  10. 0हे सिय्योन, यहोवा सदा के लिये, तेरा परमेश्वर पीढ़ी पीढ़ी राज्य करता रहेगा। याह की स्तुति करो.

भजन संहित 147 ↟↟

  1. याह की स्तुति करो. क्योंकि अपने परमेश्वर का भजन गाना अच्छा है, क्योंकि वह मन भावना है, उसकी स्तुति करनी मन भावनी है।
  2. यहोवा यरूशलेम को बसा रहा है, वह निकाले हुए इस्राएलियों को इकट्ठा कर रहा है।
  3. वह खेदित मन वालों को चंगा करता है, और उनके शोक पर मरहम- पट्टी बान्धता है।
  4. वह तारों को गिनता, और उन में से एक एक का नाम रखता है।
  5. हमारा प्रभु महान और अति सामर्थी है, उसकी बुद्धि अपरम्पार है।
  6. यहोवा नम्र लोगों को सम्भलता है, और दुष्टों को भूमि पर गिरा देता है॥
  7. धन्यवाद करते हुए यहोवा का गीत गाओ, वीणा बजाते हुए हमारे परमेश्वर का भजन गाओ।
  8. वह आकाश को मेघों से छा देता है, और पृथ्वी के लिये मेंह की तैयारी करता है, और पहाड़ों पर घास उगाता है।
  9. वह पशुओं को और कौवे के बच्चों को जो पुकारते हैं, आहार देता है।
  10. 0न तो वह घोड़े के बल को चाहता है, और न पुरूष के पैरों से प्रसन्न होता है,
  11. 1यहोवा अपने डरवैयों ही से प्रसन्न होता है, अर्थात उन से जो उसकी करूणा की आशा लगाए रहते हैं॥
  12. 2हे यरूशलेम, यहोवा की प्रशंसा कर. हे सिय्योन, अपने परमेश्वर की स्तुति कर.
  13. 3क्योंकि उसने तेरे फाटकों के खम्भों को दृढ़ किया है, और तेरे लड़के बालों को आशीष दी है।
  14. 4और तेरे सिवानों में शान्ति देता है, और तुझ को उत्तम से उत्तम गेहूं से तृप्त करता है।
  15. 5वह पृथ्वी पर अपनी आज्ञा का प्रचार करता है, उसका वचन अति वेग से दौड़ता है।
  16. 6वह ऊन के समान हिम को गिराता है, और राख की नाईं पाला बिखेरता है।
  17. 7वह बर्फ के टुकड़े गिराता है, उसकी की हुई ठण्ड को कौन सह सकता है?
  18. 8वह आज्ञा देकर उन्हें गलाता है, वह वायु बहाता है, तब जल बहने लगता है।
  19. 9वह याकूब को अपना वचन, और इस्राएल को अपनी विधियां और नियम बताता है।
  20. 0किसी और जाति से उसने ऐसा बर्ताव नहीं किया, और उसके नियमों को औरों ने नहीं जाना॥ याह की स्तुति करो।

भजन संहित 148 ↟↟

  1. याह की स्तुति करो. यहोवा की स्तुति स्वर्ग में से करो, उसकी स्तुति ऊंचे स्थानों में करो.
  2. हे उसके सब दूतों, उसकी स्तुति करो: हे उसकी सब सेना उसकी स्तुति कर.
  3. हे सूर्य और चन्द्रमा उसकी स्तुति करो, हे सब ज्योतिमय तारागण उसकी स्तुति करो.
  4. हे सब से ऊंचे आकाश, और हे आकाश के ऊपर वाले जल, तुम दोनों उसकी स्तुति करो।
  5. वे यहोवा के नाम की स्तुति करें, क्योंकि उसी ने आज्ञा दी और ये सिरजे गए।
  6. और उसने उन को सदा सर्वदा के लिये स्थिर किया है, और ऐसी विधि ठहराई है, जो टलने की नहीं॥
  7. पृथ्वी में से यहोवा की स्तुति करो, हे मगरमच्छों और गहिरे सागर,
  8. हे अग्नि और ओलो, हे हिम और कुहरे, हे उसका वचन मानने वाली प्रचण्ड बयार.
  9. हे पहाड़ों और सब टीलो, हे फलदाई वृक्षों और सब देवदारों.
  10. 0हे वन- पशुओं और सब घरैलू पशुओं, हे रेंगने वाले जन्तुओं और हे पक्षियों.
  11. 1हे पृथ्वी के राजाओं, और राज्य राज्य के सब लोगों, हे हाकिमों और पृथ्वी के सब न्यायियों.
  12. 2हे जवानों और कुमारियों, हे पुरनियों और बालकों.
  13. 3यहोवा के नाम की स्तुति करो, क्योंकि केवल उसकी का नाम महान है, उसका ऐश्वर्य पृथ्वी और आकाश के ऊपर है।
  14. 4और उसने अपनी प्रजा के लिये एक सींग ऊंचा किया है, यह उसके सब भक्तों के लिये अर्थात इस्राएलियों के लिये और उसके समीप रहने वाली प्रजा के लिये स्तुति करने का विषय है। याह की स्तुति करो।

भजन संहित 149 ↟↟

  1. याह की स्तुति करो. यहोवा के लिये नया गीत गाओ, भक्तों की सभा में उसकी स्तुति गाओ.
  2. इस्राएल अपने कर्ता के कारण आनन्दित हो, सिय्योन के निवासी अपने राजा के कारण मगन हों.
  3. वे नाचते हुए उसके नाम की स्तुति करें, और डफ और वीणा बजाते हुए उसका भजन गाएं.
  4. क्योंकि यहोवा अपनी प्रजा से प्रसन्न रहता है, वह नम्र लोगों का उद्धार कर के उन्हें शोभायमान करेगा।
  5. भक्त लोग महिमा के कारण प्रफुल्लित हों, और अपने बिछौनों पर भी पड़े पड़े जयजयकार करें।
  6. उनके कण्ठ से ईश्वर की प्रशंसा हो, और उनके हाथों में दोधारी तलवारें रहें,
  7. कि वे अन्यजातियों से पलटा ले सकें, और राज्य राज्य के लोगों को ताड़ना दें,
  8. और उनके राजाओं को सांकलों से, और उनके प्रतिष्ठित पुरूषों को लोहे की बेड़ियों से जकड़ रखें,
  9. और उन को ठहराया हुआ दण्ड दें. उसके सब भक्तों की ऐसी ही प्रतिष्ठा होगी। याह की स्तुति करो।

भजन संहित 150 ↟↟

  1. याह की स्तुति करो. ईश्वर के पवित्रस्थान में उसकी स्तुति करो, उसकी सामर्थ्य से भरे हुए आकाशमण्डल में उसी की स्तुति करो.
  2. उसके पराक्रम के कामों के कारण उसकी स्तुति करो, उसकी अत्यन्त बड़ाई के अनुसार उसकी स्तुति करो.
  3. नरसिंगा फूंकते हुए उसकी स्तुति करो, सारंगी और वीणा बजाते हुए उसकी स्तुति करो.
  4. डफ बजाते और नाचते हुए उसकी स्तुति करो, तार वाले बाजे और बांसुली बजाते हुए उसकी स्तुति करो.
  5. ऊंचे शब्द वाली झांझ बजाते हुए उसकी स्तुति करो, आनन्द के महाशब्द वाली झांझ बजाते हुए उसकी स्तुति करो.
  6. जितने प्राणी हैं सब के सब याह की स्तुति करें. याह की स्तुति करो.




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