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भजन संहिता

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भजन संहित 21 ↟↟

  1. हे यहोवा तेरी सामर्थ्य से राजा आनन्दित होगा, और तेरे किए हुए उद्धार से वह अति मगन होगा।
  2. तू ने उसके मनोरथ को पूरा किया है, और उसके मुंह की बिनती को तू ने अस्वीकार नहीं किया।
  3. क्योंकि तू उत्तम आशीषें देता हुआ उससे मिलता है और तू उसके सिर पर कुन्दन का मुकुट पहिनाता है।
  4. उसने तुझ से जीवन मांगा, ओर तू ने जीवन दान दिया, तू ने उसको युगानुयुग का जीवन दिया है।
  5. तेरे उद्धार के कारण उसकी महिमा अधिक है, तू उसको वैभव और ऐश्वर्य से आभूषित कर देता है।
  6. क्योंकि तू ने उसको सर्वदा के लिये आशीषित किया है, तू अपने सम्मुख उसको हर्ष और आनन्द से भर देता है।
  7. क्योंकि राजा का भरोसा यहोवा के ऊपर है, और परमप्रधान की करूणा से वह कभी नहीं टलने का॥
  8. तेरा हाथ तेरे सब शत्रुओं को ढूंढ़ निकालेगा, तेरा दहिना हाथ तेरे सब बैरियों का पता लगा लेगा।
  9. तू अपने मुख के सम्मुख उन्हें जलते हुए भट्टे की नाईं जलाएगा। यहोवा अपने क्रोध में उन्हें निगल जाएगा, और आग उन को भस्म कर डालेगी।
  10. 0तू उनके फलों को पृथ्वी पर से, और उनके वंश को मनुष्यों में से नष्ट करेगा।
  11. 1क्योंकि उन्होंने तेरी हानि ठानी है, उन्होंने ऐसी युक्ति निकाली है जिसे वे पूरी न कर सकेंगे।
  12. 2क्योंकि तू अपना धुनष उनके विरूद्ध चढ़ाएगा, और वे पीठ दिखाकर भागेंगे॥
  13. 3हे यहोवा, अपनी सामर्थ्य में महान हो. और हम गा गाकर तेरे पराक्रम का भजन सुनाएंगे॥

भजन संहित 22 ↟↟

  1. हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया? तू मेरी पुकार से और मेरी सहायता करने से क्यों दूर रहता है? मेरा उद्धार कहां है?
  2. हे मेरे परमेश्वर, मैं दिन को पुकारता हूं परन्तु तू उत्तर नहीं देता, और रात को भी मैं चुप नहीं रहता।
  3. परन्तु हे तू जो इस्राएल की स्तुति के सिहांसन पर विराजमान है, तू तो पवित्र है।
  4. हमारे पुरखा तुझी पर भरोसा रखते थे, वे भरोसा रखते थे, और तू उन्हें छुड़ाता था।
  5. उन्होंने तेरी दोहाई दी और तू ने उन को छुड़ाया वे तुझी पर भरोसा रखते थे और कभी लज्जित न हुए॥
  6. परन्तु मैं तो कीड़ा हूं, मनुष्य नहीं, मनुष्यों में मेरी नामधराई है, और लोगों में मेरा अपमान होता है।
  7. वह सब जो मुझे देखते हैं मेरा ठट्ठा करते हैं, और ओंठ बिचकाते और यह कहते हुए सिर हिलाते हैं,
  8. कि अपने को यहोवा के वश में कर दे वही उसको छुड़ाए, वह उसको उबारे क्योंकि वह उससे प्रसन्न है।
  9. परन्तु तू ही ने मुझे गर्भ से निकाला, जब मैं दूधपिउवा बच्च था, तब ही से तू ने मुझे भरोसा रखना सिखलाया।
  10. 0मैं जन्मते ही तुझी पर छोड़ दिया गया, माता के गर्भ ही से तू मेरा ईश्वर है।
  11. 1मुझ से दूर न हो क्योंकि संकट निकट है, और कोई सहायक नहीं।
  12. 2बहुत से सांढ़ों ने मुझे घेर लिया है, बाशान के बलवन्त सांढ़ मेरे चारों ओर मुझे घेरे हुए हैं।
  13. 3वह फाड़ने और गरजने वाले सिंह की नाईं मुझ पर अपना मुंह पसारे हुए है॥
  14. 4मैं जल की नाईं बह गया, और मेरी सब हडि्डयों के जोड़ उखड़ गए: मेरा हृदय मोम हो गया, वह मेरी देह के भीतर पिघल गया।
  15. 5मेरा बल टूट गया, मैं ठीकरा हो गया, और मेरी जीभ मेरे तालू से चिपक गई, और तू मुझे मारकर मिट्टी में मिला देता है।
  16. 6क्योंकि कुत्तों ने मुझे घेर लिया है, कुकर्मियों की मण्डली मेरी चारों ओर मुझे घेरे हुए है, वह मेरे हाथ और मेरे पैर छेदते हैं।
  17. 7मैं अपनी सब हडि्डयां गिन सकता हूं, वे मुझे देखते और निहारते हैं,
  18. 8वे मेरे वस्त्र आपस में बांटते हैं, और मेरे पहिरावे पर चिट्ठी डालते हैं।
  19. 9परन्तु हे यहोवा तू दूर न रह. हे मेरे सहायक, मेरी सहायता के लिये फुर्ती कर.
  20. 0मेरे प्राण को तलवार से बचा, मेरे प्राण को कुत्ते के पंजे से बचा ले.
  21. 1मुझे सिंह के मुंह से बचा, हां, जंगली सांढ़ों के सींगो में से तू ने मुझे बचा लिया है॥
  22. 2मैं अपने भाइयों के साम्हने तेरे नाम का प्रचार करूंगा, सभा के बीच में तेरी प्रशंसा करूंगा।
  23. 3हे यहोवा के डरवैयों उसकी स्तुति करो. हे याकूब के वंश, तुम सब उसकी महिमा करो. हे इस्त्राएल के वंश, तुम उसका भय मानो.
  24. 4क्योंकि उसने दु:खी को तुच्छ नहीं जाना और न उससे घृणा करता है, ओर न उससे अपना मुख छिपाता है, पर जब उसने उसकी दोहाई दी, तब उसकी सुन ली॥
  25. 5बड़ी सभा में मेरा स्तुति करना तेरी ही ओर से होता है, मैं अपने प्रण को उससे भय रखने वालों के साम्हने पूरा करूंगा
  26. 6नम्र लोग भोजन करके तृप्त होंगे, जो यहोवा के खोजी हैं, वे उसकी स्तुति करेंगे। तुम्हारे प्राण सर्वदा जीवित रहें.
  27. 7पृथ्वी के सब दूर दूर देशों के लोग उसको स्मरण करेंगे और उसकी ओर फिरेंगे, और जाति जाति के सब कुल तेरे साम्हने दण्डवत करेंगे।
  28. 8क्योंकि राज्य यहोवा की का है, और सब जातियों पर वही प्रभुता करता है॥
  29. 9पृथ्वी के सब हृष्टपुष्ट लोग भोजन करके दण्डवत करेंगे, वह सब जितने मिट्टी में मिल जाते हैं और अपना अपना प्राण नहीं बचा सकते, वे सब उसी के साम्हने घुटने टेकेंगे।
  30. 0एक वंश उसकी सेवा करेगा, दूसरा पीढ़ी से प्रभु का वर्णन किया जाएगा।
  31. 1वह आएंगे और उसके धर्म के कामों को एक वंश पर जो उत्पन्न होगा यह कहकर प्रगट करेंगे कि उसने ऐसे ऐसे अद्भुत काम किए॥

भजन संहित 23 ↟↟

  1. यहोवा मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी।
  2. वह मुझे हरी हरी चराइयों में बैठाता है, वह मुझे सुखदाई जल के झरने के पास ले चलता है,
  3. वह मेरे जी में जी ले आता है। धर्म के मार्गो में वह अपने नाम के निमित्त मेरी अगुवाई करता है।
  4. चाहे मैं घोर अन्धकार से भरी हुई तराई में होकर चलूं, तौभी हानि से न डरूंगा, क्योंकि तू मेरे साथ रहता है, तेरे सोंटे और तेरी लाठी से मुझे शान्ति मिलती है॥
  5. तू मेरे सताने वालों के साम्हने मेरे लिये मेज बिछाता है, तू ने मेरे सिर पर तेल मला है, मेरा कटोरा उमण्ड रहा है।
  6. निश्चय भलाई और करूणा जीवन भर मेरे साथ साथ बनी रहेंगी, और मैं यहोवा के धाम में सर्वदा वास करूंगा॥

भजन संहित 24 ↟↟

  1. पृथ्वी और जो कुछ उस में है यहोवा ही का है, जगत और उस में निवास करने वाले भी।
  2. क्योंकि उसी ने उसकी नींव समुद्रों के ऊपर दृढ़ करके रखी, और महानदों के ऊपर स्थिर किया है॥
  3. यहोवा के पर्वत पर कौन चढ़ सकता है? और उसके पवित्र स्थान में कौन खड़ा हो सकता है?
  4. जिसके काम निर्दोष और हृदय शुद्ध है, जिसने अपने मन को व्यर्थ बात की ओर नहीं लगाया, और न कपट से शपथ खाई है।
  5. वह यहोवा की ओर से आशीष पाएगा, और अपने उद्धार करने वाले परमेश्वर की ओर से धर्मी ठहरेगा।
  6. ऐसे ही लोग उसके खोजी हैं, वे तेरे दर्शन के खोजी याकूब वंशी हैं॥
  7. हे फाटकों, अपने सिर ऊंचे करो। हे सनातन के द्वारों, ऊंचे हो जाओ। क्योंकि प्रतापी राजा प्रवेश करेगा।
  8. वह प्रतापी राजा कौन है? परमेश्वर जो सामर्थी और पराक्रमी है, परमेश्वर जो युद्ध में पराक्रमी है.
  9. हे फाटकों, अपने सिर ऊंचे करो हे सनातन के द्वारों तुम भी खुल जाओ. क्योंकि प्रतापी राजा प्रवेश करेगा.
  10. 0वह प्रतापी राजा कौन है? सेनाओं का यहोवा, वही प्रतापी राजा है॥

भजन संहित 25 ↟↟

  1. हे यहोवा मैं अपने मन को तेरी ओर उठाता हूं।
  2. हे मेरे परमेश्वर, मैं ने तुझी पर भरोसा रखा है, मुझे लज्जित होने न दे, मेरे शत्रु मुझ पर जयजयकार करने न पाएं।
  3. वरन जितने तेरी बाट जोहते हैं उन में से कोई लज्जित न होगा, परन्तु जो अकारण विश्वासघाती हैं वे ही लज्जित होंगे॥
  4. हे यहोवा अपने मार्ग मुझ को दिखला, अपना पथ मुझे बता दे।
  5. मुझे अपने सत्य पर चला और शिक्षा दे, क्योंकि तू मेरा उद्धार करने वाला परमेश्वर है, मैं दिन भर तेरी ही बाट जोहता रहता हूं।
  6. हे यहोवा अपनी दया और करूणा के कामों को स्मरण कर, क्योंकि वे तो अनन्तकाल से होते आए हैं।
  7. हे यहोवा अपनी भलाई के कारण मेरी जवानी के पापों और मेरे अपराधों को स्मरण न कर, अपनी करूणा ही के अनुसार तू मुझे स्मरण कर॥
  8. यहोवा भला और सीधा है, इसलिये वह पापियों को अपना मार्ग दिखलाएगा।
  9. वह नम्र लोगों को न्याय की शिक्षा देगा, हां वह नम्र लोगों को अपना मार्ग दिखलाएगा।
  10. 0जो यहोवा की वाचा और चितौनियों को मानते हैं, उनके लिये उसके सब मार्ग करूणा और सच्चाई हैं॥
  11. 1हे यहोवा अपने नाम के निमित्त मेरे अधर्म को जो बहुत हैं क्षमा कर॥
  12. 2वह कौन है जो यहोवा का भय मानता है? यहोवा उसको उसी मार्ग पर जिस से वह प्रसन्न होता है चलाएगा।
  13. 3वह कुशल से टिका रहेगा, और उसका वंश पृथ्वी पर अधिकारी होगा।
  14. 4यहोवा के भेद को वही जानते हैं जो उससे डरते हैं, और वह अपनी वाचा उन पर प्रगट करेगा।
  15. 5मेरी आंखे सदैव यहोवा पर टकटकी लगाए रहती हैं, क्योंकि वही मेरे पांवों को जाल में से छुड़ाएगा॥
  16. 6हे यहोवा मेरी ओर फिरकर मुझ पर अनुग्रह कर, क्योंकि मैं अकेला और दीन हूं।
  17. 7मेरे हृदय का क्लेश बढ़ गया है, तू मुझ को मेरे दु:खों से छुड़ा ले।
  18. 8तू मेरे दु:ख और कष्ट पर दृष्टि कर, और मेरे सब पापों को क्षमा कर॥
  19. 9मेरे शत्रुओं को देख कि वे कैसे बढ़ गए हैं, और मुझ से बड़ा बैर रखते हैं।
  20. 0मेरे प्राण की रक्षा कर, और मुझे छुड़ा, मुझे लज्जित न होने दे, क्योंकि मैं तेरा शरणागत हूं।
  21. 1खराई और सीधाई मुझे सुरक्षित रखें, क्योंकि मुझे तेरे ही आशा है॥
  22. 2हे परमेश्वर इस्राएल को उसके सारे संकटों से छुड़ा ले॥

भजन संहित 26 ↟↟

  1. हे यहोवा, मेरा न्याय कर, क्योंकि मैं खराई से चलता रहा हूं, और मेरा भरोसा यहोवा पर अटल बना है।
  2. हे यहोवा, मुझ को जांच और परख, मेरे मन और हृदय को परख।
  3. क्योंकि तेरी करूणा तो मेरी आंखों के साम्हने है, और मैं तेरे सत्य मार्ग पर चलता रहा हूं॥
  4. मैं निकम्मी चाल चलने वालों के संग नहीं बैठा, और न मैं कपटियों के साथ कहीं जाऊंगा,
  5. मैं कुकर्मियों की संगति से घृणा रखता हूं, और दुष्टों के संग न बैठूंगा॥
  6. मैं अपने हाथों को निर्दोषता के जल से धोऊंगा, तब हे यहोवा मैं तेरी वेदी की प्रदक्षिणा करूंगा,
  7. ताकि तेरा धन्यवाद ऊंचे शब्द से करूं,
  8. और तेरे सब आश्चर्यकर्मों का वर्णन करूं॥ हे यहोवा, मैं तेरे धाम से तेरी महिमा के निवास स्थान से प्रीति रखता हूं।
  9. मेरे प्राण को पापियों के साथ, और मेरे जीवन को हत्यारों के साथ न मिला।
  10. 0वे तो ओछापन करने में लगे रहते हैं, और उनका दाहिना हाथ घूस से भरा रहता है॥
  11. 1परन्तु मैं तो खराई से चलता रहूंगा। तू मुझे छुड़ा ले, और मुझ पर अनुग्रह कर।
  12. 2मेरे पांव चौरस स्थान में स्थिर है, सभाओं में मैं यहोवा को धन्य कहा करूंगा॥

भजन संहित 27 ↟↟

  1. यहोवा परमेश्वर मेरी ज्योति और मेरा उद्धार है, मैं किस से डरूं? यहोवा मेरे जीवन का दृढ़ गढ़ ठहरा है, मैं किस का भय खाऊं?
  2. जब कुकर्मियों ने जो मुझे सताते और मुझी से बैर रखते थे, मुझे खा डालने के लिये मुझ पर चढ़ाई की, तब वे ही ठोकर खाकर गिर पड़े॥
  3. चाहे सेना भी मेरे विरुद्ध छावनी डाले, तौभी मैं न डरूंगा, चाहे मेरे विरुद्ध लड़ाई ठन जाए, उस दशा में भी मैं हियाव बान्धे निशचिंत रहूंगा॥
  4. एक वर मैं ने यहोवा से मांगा है, उसी के यत्न में लगा रहूंगा, कि मैं जीवन भर यहोवा के भवन में रहने पाऊं, जिस से यहोवा की मनोहरता पर दृष्टि लगाए रहूं, और उसके मन्दिर में ध्यान किया करूं॥
  5. क्योंकि वह तो मुझे विपत्ति के दिन में अपने मण्डप में छिपा रखेगा, अपने तम्बू के गुप्त स्थान में वह मुझे छिपा लेगा, और चट्टान पर चढ़ाएगा।
  6. अब मेरा सिर मेरे चारों ओर के शत्रुओं से ऊंचा होगा, और मैं यहोवा के तम्बू में जयजयकार के साथ बलिदान चढ़ाऊंगा, और उसका भजन गाऊंगा॥
  7. हे यहोवा, मेरा शब्द सुन, मैं पुकारता हूं, तू मुझ पर अनुग्रह कर और मुझे उत्तर दे।
  8. तू ने कहा है, कि मेरे दर्शन के खोजी हो। इसलिये मेरा मन तुझ से कहता है, कि हे यहोवा, तेरे दर्शन का मैं खोजी रहूंगा।
  9. अपना मुख मुझ से न छिपा॥ अपने दास को क्रोध करके न हटा, तू मेरा सहायक बना है। हे मेरे उद्धार करने वाले परमेश्वर मुझे त्याग न दे, और मुझे छोड़ न दे.
  10. 0मेरे माता पिता ने तो मुझे छोड़ दिया है, परन्तु यहोवा मुझे सम्भाल लेगा॥
  11. 1हे यहोवा, अपने मार्ग में मेरी अगुवाई कर, और मेरे द्रोहियों के कारण मुझ को चौरस रास्ते पर ले चल।
  12. 2मुझ को मेरे सताने वालों की इच्छा पर न छोड़, क्योंकि झूठे साक्षी जो उपद्रव करने की धुन में हैं मेरे विरुद्ध उठे हैं॥
  13. 3यदि मुझे विश्वास न होता कि जीवितों की पृथ्वी पर यहोवा की भलाई को देखूंगा, तो मैं मूर्च्छित हो जाता।
  14. 4यहोवा की बाट जोहता रह, हियाव बान्ध और तेरा हृदय दृढ़ रहे, हां, यहोवा ही की बाट जोहता रह.

भजन संहित 28 ↟↟

  1. हे यहोवा, मैं तुझी को पुकारूंगा, हे मेरी चट्टान, मेरी सुनी अनसुनी न कर, ऐसा न हो कि तेरे चुप रहने से मैं कब्र में पड़े हुओं के समान हो जाऊं जो पाताल में चले जाते हैं।
  2. जब मैं तेरी दोहाई दूं, और तेरे पवित्र स्थान की भीतरी कोठरी की ओर अपने हाथ उठाऊं, तब मेरी गिड़गिड़ाहट की बात सुन ले।
  3. उन दुष्टों और अनर्थकारियों के संग मुझे न घसीट, जो अपने पड़ोसियों बातें तो मेल की बोलते हैं परन्तु हृदय में बुराई रखते हैं।
  4. उनके कामों के और उनकी करनी की बुराई के अनुसार उन से बर्ताव कर, उनके हाथों के काम के अनुसार उन्हें बदला दे, उनके कामों का पलटा उन्हें दे।
  5. वे यहोवा के कामों पर और उसके हाथों के कामों पर ध्यान नहीं करते, इसलिये वह उन्हें पछाड़ेगा और फिर न उठाएगा॥
  6. यहोवा धन्य है, क्योंकि उसने मेरी गिड़गिड़ाहट को सुना है।
  7. यहोवा मेरा बल और मेरी ढ़ाल है, उस पर भरोसा रखने से मेरे मन को सहायता मिली है, इसलिये मेरा हृदय प्रफुल्लित है, और मैं गीत गाकर उसका धन्यवाद करूंगा।
  8. यहोवा उनका बल है, वह अपने अभिषिक्त के लिये उद्धार का दृढ़ गढ़ है।
  9. हे यहोवा अपनी प्रजा का उद्धार कर, और अपने निज भाग के लोगों को आशीष दे, और उनकी चरवाही कर और सदैव उन्हें सम्भाले रह॥

भजन संहित 29 ↟↟

  1. हे परमेश्वर के पुत्रों यहोवा का, हां यहोवा ही का गुणानुवाद करो, यहोवा की महिमा और सामर्थ को सराहो।
  2. यहोवा के नाम की महिमा करो, पवित्रता से शोभायमान होकर यहोवा को दण्डवत् करो।
  3. यहोवा की वाणी मेघों के ऊपर सुन पड़ती है, प्रतापी ईश्वर गरजता है, यहोवा घने मेघों के ऊपर रहता है।
  4. यहोवा की वाणी शक्तिशाली है, यहोवा की वाणी प्रतापमय है।
  5. यहोवा की वाणी देवदारों को तोड़ डालती है, यहोवा लबानोन के देवदारों को भी तोड़ डालता है।
  6. वह उन्हें बछड़े की नाईं और लबानोन और शिर्योन को जंगली बछड़े के समान उछालता है॥
  7. यहोवा की वाणी आग की लपटों को चीरती है।
  8. यहोवा की वाणी वन को हिला देती है, यहोवा कादेश के वन को भी कंपाता है॥
  9. यहोवा की वाणी से हरिणियों का गर्भपात हो जाता है। और अरण्य में पतझड़ होती है, और उसके मन्दिर में सब कोई महिमा ही महिमा बोलता रहता है॥
  10. 0जलप्रलय के समय यहोवा विराजमान था, और यहोवा सर्वदा के लिये राजा होकर विराजमान रहता है।
  11. 1यहोवा अपनी प्रजा को बल देगा, यहोवा अपनी प्रजा को शान्ति की आशीष देगा॥

भजन संहित 30 ↟↟

  1. हे यहोवा मैं तुझे सराहूंगा, क्योंकि तू ने मुझे खींचकर निकाला है, और मेरे शत्रुओं को मुझ पर आनन्द करने नहीं दिया।
  2. हे मेरे परमेश्वर यहोवा, मैं ने तेरी दोहाई दी और तू ने मुझे चंगा किया है।
  3. हे यहोवा, तू ने मेरा प्राण अधोलोक में से निकाला है, तू ने मुझ को जीवित रखा और कब्र में पड़ने से बचाया है॥
  4. हे यहोवा के भक्तों, उसका भजन गाओ, और जिस पवित्र नाम से उसका स्मरण होता है, उसका धन्यवाद करो।
  5. क्योंकि उसका क्रोध, तो क्षण भर का होता है, परन्तु उसकी प्रसन्नता जीवन भर की होती है। कदाचित् रात को रोना पड़े, परन्तु सबेरे आनन्द पहुंचेगा॥
  6. मैं ने तो अपने चैन के समय कहा था, कि मैं कभी नहीं टलने का।
  7. हे यहोवा अपनी प्रसन्नता से तू ने मेरे पहाड़ को दृढ़ और स्थिर किया था, जब तू ने अपना मुख फेर लिया तब मैं घबरा गया॥
  8. हे यहोवा मैं ने तुझी को पुकारा, और यहोवा से गिड़गिड़ाकर यह बिनती की, कि
  9. जब मैं कब्र में चला जाऊंगा तब मेरे लोहू से क्या लाभ होगा? क्या मिट्टी तेरा धन्यवाद कर सकती है? क्या वह तेरी सच्चाई का प्रचार कर सकती है?
  10. 0हे यहोवा, सुन, मुझ पर अनुग्रह कर, हे यहोवा, तू मेरा सहायक हो॥
  11. 1तू ने मेरे लिये विलाप को नृत्य में बदल डाला, तू ने मेरा टाट उतरवाकर मेरी कमर में आनन्द का पटुका बान्धा है,
  12. 2ताकि मेरी आत्मा तेरा भजन गाती रहे और कभी चुप न हो। हे मेरे परमेश्वर यहोवा, मैं सर्वदा तेरा धन्यवाद करता रहूंगा॥

भजन संहित 31 ↟↟

  1. हे यहोवा मेरा भरोसा तुझ पर है, मुझे कभी लज्जित होना न पड़े, तू अपने धर्मी होने के कारण मुझे छुड़ा ले.
  2. अपना कान मेरी ओर लगाकर तुरन्त मुझे छुड़ा ले.
  3. क्योंकि तू मेरे लिये चट्टान और मेरा गढ़ है, इसलिये अपने नाम के निमित्त मेरी अगुवाई कर, और मुझे आगे ले चल।
  4. जो जाल उन्होंने मेरे लिये बिछाया है उससे तू मुझ को छुड़ा ले, क्योंकि तू ही मेरा दृढ़ गढ़ है।
  5. मैं अपनी आत्मा को तेरे ही हाथ में सौंप देता हूं, हे यहोवा, हे सत्यवादी ईश्वर, तू ने मुझे मोल लेकर मुक्त किया है॥
  6. जो व्यर्थ वस्तुओं पर मन लगाते हैं, उन से मैं घृणा करता हूं, परन्तु मेरा भरोसा यहोवा ही पर है।
  7. मैं तेरी करूणा से मगन और आनन्दित हूं, क्योंकि तू ने मेरे दु:ख पर दृष्टि की है, मेरे कष्ट के समय तू ने मेरी सुधि ली है,
  8. और तू ने मुझे शत्रु के हाथ में पड़ने नहीं दिया, तू ने मेरे पांवों को चौड़े स्थान में खड़ा किया है॥
  9. हे यहोवा, मुझ पर अनुग्रह कर क्योंकि मैं संकट में हूं, मेरी आंखे वरन मेरा प्राण और शरीर सब शोक के मारे घुले जाते हैं।
  10. 0मेरा जीवन शोक के मारे और मेरी अवस्था कराहते कराहते घट चली है, मेरा बल मेरे अधर्म के कारण जाता रह, और मेरी हडि्डयां घुल गई॥
  11. 1अपने सब विरोधियों के कारण मेरे पड़ोसियों में मेरी नामधराई हुई है, अपने जान पहिचान वालों के लिये डर का कारण हूं, जो मुझ को सड़क पर देखते है वह मुझ से दूर भाग जाते हैं।
  12. 2मैं मृतक की नाईं लोगों के मन से बिसर गया, मैं टूटे बर्तन के समान हो गया हूं।
  13. 3मैं ने बहुतों के मुंह से अपना अपवाद सुना, चारों ओर भय ही भय है. जब उन्होंने मेरे विरुद्ध आपस में सम्मति की तब मेरे प्राण लेने की युक्ति की॥
  14. 4परन्तु हे यहोवा मैं ने तो तुझी पर भरोसा रखा है, मैं ने कहा, तू मेरा परमेश्वर है।
  15. 5मेरे दिन तेरे हाथ में है, तू मुझे मेरे शत्रुओं और मेरे सताने वालों के हाथ से छुड़ा।
  16. 6अपने दास पर अपने मुंह का प्रकाश चमका, अपनी करूणा से मेरा उद्धार कर॥
  17. 7हे यहोवा, मुझे लज्जित न होने दे क्योंकि मैं ने तुझ को पुकारा है, दुष्ट लज्जित हों और वे पाताल में चुपचाप पड़े रहें।
  18. 8जो अंहकार और अपमान से धर्मी की निन्दा करते हैं, उनके झूठ बोलने वाले मुंह बन्द किए जाएं॥
  19. 9आहा, तेरी भलाई क्या ही बड़ी है जो तू ने अपने डरवैयों के लिये रख छोड़ी है, और अपने शरणागतों के लिये मनुष्यों के साम्हने प्रगट भी की है.
  20. 0तू उन्हें दर्शन देने के गुप्त स्थान में मनुष्यों की बुरी गोष्ठी से गुप्त रखेगा, तू उन को अपने मण्डप में झगड़े-रगड़े से छिपा रखेगा॥
  21. 1यहोवा धन्य है, क्योंकि उसने मुझे गढ़ वाले नगर में रखकर मुझ पर अद्धभुत करूणा की है।
  22. 2मैं ने तो घबराकर कहा था कि मैं यहोवा की दृष्टि से दूर हो गया। तौभी जब मैं ने तेरी दोहाई दी, तब तू ने मेरी गिड़गिड़ाहट को सुन लिया॥
  23. 3हे यहोवा के सब भक्तों उससे प्रेम रखो. यहोवा सच्चे लोगों की तो रक्षा करता है, परन्तु जो अहंकार करता है, उसको वह भली भांति बदला देता है।
  24. 4हे यहोवा परआशा रखने वालों हियाव बान्धो और तुम्हारे हृदय दृढ़ रहें.

भजन संहित 32 ↟↟

  1. क्या ही धन्य है वह जिसका अपराध क्षमा किया गया, और जिसका पाप ढ़ाँपा गया हो।
  2. क्या ही धन्य है वह मनुष्य जिसके अधर्म का यहोवा लेखा न ले, और जिसकी आत्मा में कपट न हो॥
  3. जब मैं चुप रहा तब दिन भर कराहते कराहते मेरी हडि्डयां पिघल गई।
  4. क्योंकि रात दिन मैं तेरे हाथ के नीचे दबा रहा, और मेरी तरावट धूप काल की सी झुर्राहट बनती गई॥
  5. जब मैं ने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया और अपना अधर्म न छिपाया, और कहा, मैं यहोवा के साम्हने अपने अपराधों को मान लूंगा, तब तू ने मेरे अधर्म और पाप को क्षमा कर दिया॥
  6. इस कारण हर एक भक्त तुझ से ऐसे समय में प्रार्थना करे जब कि तू मिल सकता है। निश्चय जब जल की बड़ी बाढ़ आए तौभी उस भक्त के पास न पहुंचेगी।
  7. तू मेरे छिपने का स्थान है, तू संकट से मेरी रक्षा करेगा, तू मुझे चारों ओर से छुटकारे के गीतों से घेर लेगा॥
  8. मैं तुझे बुद्धि दूंगा, और जिस मार्ग में तुझे चलना होगा उस में तेरी अगुवाई करूंगा, मैं तुझ पर कृपा दृष्टि रखूंगा और सम्मत्ति दिया करूंगा।
  9. तुम घोड़े और खच्चर के समान न बनो जो समझ नहीं रखते, उनकी उमंग लगाम और बाग से रोकनी पड़ती है, नहीं तो वे तेरे वश में नहीं आने के॥
  10. 0दुष्ट को तो बहुत पीड़ा होगी, परन्तु जो यहोवा पर भरोसा रखता है वह करूणा से घिरा रहेगा।
  11. 1हे धर्मियों यहोवा के कारण आनन्दित और मगन हो, और हे सब सीधे मन वालों आनन्द से जयजयकार करो.

भजन संहित 33 ↟↟

  1. हे धर्मियों यहोवा के कारण जयजयकार करो क्योंकि धर्मी लोगों को स्तुति करनी सोहती है।
  2. वीणा बजा बजाकर यहोवा का धन्यवाद करो, दस तार वाली सारंगी बजा बजाकर उसका भजन गाओ।
  3. उसके लिये नया गीत गाओ, जयजयकार के साथ भली भांति बजाओ॥
  4. क्योंकि यहोवा का वचन सीधा है, और उसका सब काम सच्चाई से होता है।
  5. वह धर्म और न्याय से प्रीति रखता है, यहोवा की करूणा से पृथ्वी भरपूर है॥
  6. आकाशमण्डल यहोवा के वचन से, और उसके सारे गण उसके मुंह ही श्वास से बने।
  7. वह समुद्र का जल ढेर की नाईं इकट्ठा करता, वह गहिरे सागर को अपने भण्डार में रखता है॥
  8. सारी पृथ्वी के लोग यहोवा से डरें, जगत के सब निवासी उसका भय मानें.
  9. क्योंकि जब उसने कहा, तब हो गया, जब उसने आज्ञा दी, तब वास्तव में वैसा ही हो गया॥
  10. 0यहोवा अन्य अन्य जातियों की युक्ति को व्यर्थ कर देता है, वह देश देश के लोगों की कल्पनाओं को निष्फल करता है।
  11. 1यहोवा की युक्ति सर्वदा स्थिर रहेगी, उसके मन की कल्पनाएं पीढ़ी से पीढ़ी तक बनी रहेंगी।
  12. 2क्या ही धन्य है वह जाति जिसका परमेश्वर यहोवा है, और वह समाज जिसे उसने अपना निज भाग होने के लिये चुन लिया हो.
  13. 3यहोवा स्वर्ग से दृष्टि करता है, वह सब मनुष्यों को निहारता है,
  14. 4अपने निवास के स्थान से वह पृथ्वी के सब रहने वालों को देखता है,
  15. 5वही जो उन सभों के हृदयों को गढ़ता, और उनके सब कामों का विचार करता है।
  16. 6कोई ऐसा राजा नहीं, जो सेना की बहुतायत के कारण बच सके, वीर अपनी बड़ी शक्ति के कारण छूट नहीं जाता।
  17. 7बच निकलने के लिये घोड़ा व्यर्थ है, वह अपने बड़े बल के द्वारा किसी को नहीं बचा सकता है॥
  18. 8देखो, यहोवा की दृष्टि उसके डरवैयों पर और उन पर जो उसकी करूणा की आशा रखते हैं बनी रहती है,
  19. 9कि वह उनके प्राण को मृत्यु से बचाए, और अकाल के समय उन को जीवित रखे॥
  20. 0हम यहोवा का आसरा देखते आए हैं, वह हमारा सहायक और हमारी ढाल ठहरा है।
  21. 1हमारा हृदय उसके कारण आनन्दित होगा, क्योंकि हम ने उसके पवित्र नाम का भरोसा रखा है।
  22. 2हे यहोवा जैसी तुझ पर हमारी आशा है, वैसी ही तेरी करूणा भी हम पर हो॥

भजन संहित 34 ↟↟

  1. मैं हर समय यहोवा को धन्य कहा करूंगा, उसकी स्तुति निरन्तर मेरे मुख से होती रहेगी।
  2. मैं यहोवा पर घमण्ड करूंगा, नम्र लोग यह सुनकर आनन्दित होंगे।
  3. मेरे साथ यहोवा की बड़ाई करो, और आओ हम मिलकर उसके नाम की स्तुति करें।
  4. मैं यहोवा के पास गया, तब उसने मेरी सुन ली, और मुझे पूरी रीति से निर्भय किया।
  5. जिन्होंने उसकी ओर दृष्टि की उन्होंने ज्योति पाई, और उनका मुंह कभी काला न होने पाया।
  6. इस दीन जन ने पुकारा तब यहोवा ने सुन लिया, और उसको उसके सब कष्टों से छुड़ा लिया॥
  7. यहोवा के डरवैयों के चारों ओर उसका दूत छावनी किए हुए उन को बचाता है।
  8. परखकर देखो कि यहोवा कैसा भला है. क्या ही धन्य है वह पुरूष जो उसकी शरण लेता है।
  9. हे यहोवा के पवित्र लोगो, उसका भय मानो, क्योंकि उसके डरवैयों को किसी बात की घटी नहीं होती.
  10. 0जवान सिंहों तो घटी होती और वे भूखे भी रह जाते हैं, परन्तु यहोवा के खोजियों को किसी भली वस्तु की घटी न होवेगी॥
  11. 1हे लड़कों, आओ, मेरी सुनो, मैं तुम को यहोवा का भय मानना सिखाऊंगा।
  12. 2वह कौन मनुष्य है जो जीवन की इच्छा रखता, और दीर्घायु चाहता है ताकि भलाई देखे?
  13. 3अपनी जीभ को बुराई से रोक रख, और अपने मुंह की चौकसी कर कि उससे छल की बात न निकले।
  14. 4बुराई को छोड़ और भलाई कर, मेल को ढूंढ और उसी का पीछा कर॥
  15. 5यहोवा की आंखे धर्मियों पर लगी रहती हैं, और उसके कान भी उसकी दोहाई की ओर लगे रहते हैं।
  16. 6यहोवा बुराई करने वालों के विमुख रहता है, ताकि उनका स्मरण पृथ्वी पर से मिटा डाले।
  17. 7धर्मी दोहाई देते हैं और यहोवा सुनता है, और उन को सब विपत्तियों से छुड़ाता है।
  18. 8यहोवा टूटे मन वालों के समीप रहता है, और पिसे हुओं का उद्धार करता है॥
  19. 9धर्मी पर बहुत सी विपत्तियां पड़ती तो हैं, परन्तु यहोवा उसको उन सब से मुक्त करता है।
  20. 0वह उसकी हड्डी हड्डी की रक्षा करता है, और उन में से एक भी टूटने नहीं पाती।
  21. 1दुष्ट अपनी बुराई के द्वारा मारा जाएगा, और धर्मी के बैरी दोषी ठहरेंगे।
  22. 2यहोवा अपने दासों का प्राण मोल लेकर बचा लेता है, और जितने उसके शरणागत हैं उन में से कोई भी दोषी न ठहरेगा॥

भजन संहित 35 ↟↟

  1. हे यहोवा जो मेरे साथ मुकद्दमा लड़ते हैं, उनके साथ तू भी मुकद्दमा लड़, जो मुझ से युद्ध करते हैं, उन से तू युद्ध कर।
  2. ढाल और भाला लेकर मेरी सहायता करने को खड़ा हो।
  3. बर्छी को खींच और मेरा पीछा करने वालों के साम्हने आकर उन को रोक, और मुझ से कह, कि मैं तेरा उद्धार हूं॥
  4. जो मेरे प्राण के ग्राहक हैं वे लज्जित और निरादर हों. जो मेरी हानि की कल्पना करते हैं, वह पीछे हटाए जाएं और उनका मुंह काला हो.
  5. वे वायु से उड़ जाने वाली भूसी के समान हों, और यहोवा का दूत उन्हें हांकता जाए.
  6. उनका मार्ग अन्धियारा और फिसलन भरा हो, और यहोवा का दूत उन को खदेड़ता जाए॥
  7. क्योंकि अकारण उन्होंने मेरे लिये अपना जाल गड़हे में बिछाया, अकारण ही उन्होंने मेरा प्राण लेने के लिये गड़हा खोदा है।
  8. अचानक उन पर विपत्ति आ पड़े. और जो जाल उन्होंने बिछाया है उसी में वे आप ही फंसे, और उसी विपत्ति में वे आप ही पड़ें.
  9. परन्तु मैं यहोवा के कारण अपने मन में मगन होऊंगा, मैं उसके किए हुए उद्धार से हर्षित होऊंगा।
  10. 0मेरी हड्डी हड्डी कहेगी, हे यहोवा तेरे तुल्य कौन है, जो दीन को बड़े बड़े बलवन्तों से बचाता है, और लुटेरों से दीन दरिद्र लोगों की रक्षा करता है?
  11. 1झूठे साक्षी खड़े होते हैं, और जो बात मैं नहीं जानता, वही मुझ से पूछते हैं।
  12. 2वे मुझ से भलाई के बदले बुराई करते हैं, यहां तक कि मेरा प्राण ऊब जाता है।
  13. 3जब वे रोगी थे तब तो मैं टाट पहिने रहा, और उपवास कर करके दु:ख उठाता रहा, और मेरी प्रार्थना का फल मेरी गोद में लौट आया।
  14. 4मैं ऐसा भाव रखता था कि मानो वे मेरे संगी वा भाई हैं, जैसा कोई माता के लिये विलाप करता हो, वैसा ही मैं ने शोक का पहिरावा पहिने हुए सिर झुकाकर शोक किया॥
  15. 5परन्तु जब मैं लंगड़ाने लगा तब वे लोग आनन्दित होकर इकट्ठे हुए, नीच लोग और जिन्हें मैं जानता भी न था वे मेरे विरुद्ध इकट्ठे हुए, वे मुझे लगातार फाड़ते रहे,
  16. 6उन पाखण्डी भांड़ों की नाईं जो पेट के लिये उपहास करते हैं, वे भी मुझ पर दांत पीसते हैं॥
  17. 7हे प्रभु तू कब तक देखता रहेगा? इस विपत्ति से, जिस में उन्होंने मुझे डाला है मुझ को छुड़ा. जवान सिंहों से मेरे प्राण को बचा ले.
  18. 8मैं बड़ी सभा में तेरा धन्यवाद करूंगा, बहुतेरे लोगों के बीच में तेरी स्तुति करूंगा॥
  19. 9मेरे झूठ बोलने वाले शत्रु मेरे विरुद्ध आनन्द न करने पाएं, जो अकारण मेरे बैरी हैं, वे आपस में नैन से सैन न करने पांए।
  20. 0क्योंकि वे मेल की बातें नहीं बोलते, परन्तु देश में जो चुपचाप रहते हैं, उनके विरुद्ध छल की कल्पनाएं करते हैं।
  21. 1और उन्होंने मेरे विरुद्ध मुंह पसार के कहा, आहा, आहा, हम ने अपनी आंखों से देखा है.
  22. 2हे यहोवा, तू ने तो देखा है, चुप न रह. हे प्रभु, मुझ से दूर न रह.
  23. 3उठ, मेरे न्याय के लिये जाग, हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे प्रभु, मेरे मुकद्दमा निपटाने के लिये आ.
  24. 4हे मेरे परमेश्वर यहोवा, तू अपने धर्म के अनुसार मेरा न्याय चुका, और उन्हें मेरे विरुद्ध आनन्द करने न दे.
  25. 5वे मन में न कहने पाएं, कि आहा. हमारी तो इच्छा पूरी हुई. वह यह न कहें कि हम उसे निगल गए हैं॥
  26. 6जो मेरी हानि से आनन्दित होते हैं उनके मुंह लज्जा के मारे एक साथ काले हों. जो मेरे विरुद्ध बड़ाई मारते हैं वह लज्जा और अनादर से ढ़ंप जाएं.
  27. 7जो मेरे धर्म से प्रसन्न रहते हैं, वह जयजयकार और आनन्द करें, और निरन्तर कहते रहें, यहोवा की बड़ाई हो, जो अपने दास के कुशल से प्रसन्न होता है.
  28. 8तब मेरे मुंह से तेरे धर्म की चर्चा होगी, और दिन भर तेरी स्तुति निकलेगी॥

भजन संहित 36 ↟↟

  1. दुष्ट जन का अपराध मेरे हृदय के भीतर यह कहता है कि परमेश्वर का भय उसकी दृष्टि में नहीं है।
  2. वह अपने अधर्म के प्रगट होने और घृणित ठहरने के विषय अपने मन में चिकनी चुपड़ी बातें विचारता है।
  3. उसकी बातें अनर्थ और छल की हैं, उसने बुद्धि और भलाई के काम करने से हाथ उठाया है।
  4. वह अपने बिछौने पर पड़े पड़े अनर्थ की कल्पना करता है, वह अपने कुमार्ग पर दृढ़ता से बना रहता है, बुराई से वह हाथ नहीं उठाता॥
  5. हे यहोवा तेरी करूणा स्वर्ग में है, तेरी सच्चाई आकाश मण्डल तक पहुंची है।
  6. तेरा धर्म ऊंचे पर्वतों के समान है, तेरे नियम अथाह सागर ठहरे हैं, हे यहोवा तू मनुष्य और पशु दोनों की रक्षा करता है॥
  7. हे परमेश्वर तेरी करूणा, कैसी अनमोल है. मनुष्य तेरे पंखो के तले शरण लेते हैं।
  8. वे तेरे भवन के चिकने भोजन से तृप्त होंगे, और तू अपनी सुख की नदी में से उन्हें पिलाएगा।
  9. क्योंकि जीवन का सोता तेरे ही पास है, तेरे प्रकाश के द्वारा हम प्रकाश पाएंगे॥
  10. 0अपने जानने वालों पर करूणा करता रह, और अपने धर्म के काम सीधे मन वालों में करता रह.
  11. 1अहंकारी मुझ पर लात उठाने न पाए, और न दुष्ट अपने हाथ के बल से मुझे भगाने पाए।
  12. 2वहां अनर्थकारी गिर पड़े हैं, वे ढकेल दिए गए, और फिर उठ न सकेंगे॥

भजन संहित 37 ↟↟

  1. कुकर्मियों के कारण मत कुढ़, कुटिल काम करने वालों के विषय डाह न कर.
  2. क्योंकि वे घास की नाईं झट कट जाएंगे, और हरी घास की नाईं मुर्झा जाएंगे।
  3. यहोवा पर भरोसा रख, और भला कर, देश में बसा रह, और सच्चाई में मन लगाए रह।
  4. यहोवा को अपने सुख का मूल जान, और वह तेरे मनोरथों को पूरा करेगा॥
  5. अपने मार्ग की चिन्ता यहोवा पर छोड़, और उस पर भरोसा रख, वही पूरा करेगा।
  6. और वह तेरा धर्म ज्योति की नाईं, और तेरा न्याय दोपहर के उजियाले की नाईं प्रगट करेगा॥
  7. यहोवा के साम्हने चुपचाप रह, और धीरज से उसका आसरा रख, उस मनुष्य के कारण न कुढ़, जिसके काम सुफल होते हैं, और वह बुरी युक्तियों को निकालता है.
  8. क्रोध से परे रह, और जलजलाहट को छोड़ दे. मत कुढ़, उससे बुराई ही निकलेगी।
  9. क्योंकि कुकर्मी लोग काट डाले जाएंगे, और जो यहोवा की बाट जोहते हैं, वही पृथ्वी के अधिकारी होंगे।
  10. 0थोड़े दिन के बीतने पर दुष्ट रहेगा ही नहीं, और तू उसके स्थान को भलीं भांति देखने पर भी उसको न पाएगा।
  11. 1परन्तु नम्र लोग पृथ्वी के अधिकारी होंगे, और बड़ी शान्ति के कारण आनन्द मनाएंगे।
  12. 2दुष्ट धर्मी के विरुद्ध बुरी युक्ति निकालता है, और उस पर दांत पीसता है,
  13. 3परन्तु प्रभु उस पर हंसेगा, क्योंकि वह देखता है कि उसका दिन आने वाला है॥
  14. 4दुष्ट लोग तलवार खींचे और धनुष बढ़ाए हुए हैं, ताकि दीन दरिद्र को गिरा दें, और सीधी चाल चलने वालों को वध करें।
  15. 5उनकी तलवारों से उन्हीं के हृदय छिदेंगे, और उनके धनुष तोड़े जाएंगे॥
  16. 6धर्मी का थोड़ा से माल दुष्टों के बहुत से धन से उत्तम है।
  17. 7क्योंकि दुष्टोंकी भुजाएं तो तोड़ी जाएंगी, परन्तु यहोवा धर्मियों को सम्भालता है॥
  18. 8यहोवा खरे लोगों की आयु की सुधि रखता है, और उनका भाग सदैव बना रहेगा।
  19. 9विपत्ति के समय, उनकी आशा न टूटेगी और न वे लज्जित होंगे, और अकाल के दिनों में वे तृप्त रहेंगे॥
  20. 0दुष्ट लोग नाश हो जाएंगे, और यहोवा के शत्रु खेत की सुथरी घास की नाईं नाश होंगे, वे धूएं की नाईं बिलाय जाएंगे॥
  21. 1दुष्ट ऋण लेता है, और भरता नहीं परन्तु धर्मीं अनुग्रह करके दान देता है,
  22. 2क्योंकि जो उससे आशीष पाते हैं वे तो पृथ्वी के अधिकारी होंगे, परन्तु जो उससे शापित होते हैं, वे नाश को जाएंगे॥
  23. 3मनुष्य की गति यहोवा की ओर से दृढ़ होती है, और उसके चलन से वह प्रसन्न रहता है,
  24. 4चाहे वह गिरे तौभी पड़ा न रह जाएगा, क्योंकि यहोवा उसका हाथ थामे रहता है॥
  25. 5मैं लड़कपन से लेकर बुढ़ापे तक देखता आया हूं, परन्तु न तो कभी धर्मी को त्यागा हुआ, और न उसके वंश को टुकड़े मांगते देखा है।
  26. 6वह तो दिन भर अनुग्रह कर करके ऋण देता है, और उसके वंश पर आशीष फलती रहती है॥
  27. 7बुराई को छोड़ भलाई कर, और तू सर्वदा बना रहेगा।
  28. 8क्योंकि यहोवा न्याय से प्रीति रखता, और अपने भक्तों को न तजेगा। उनकी तो रक्षा सदा होती है, परन्तु दुष्टों का वंश काट डाला जाएगा।
  29. 9धर्मी लोग पृथ्वी के अधिकारी होंगे, और उस में सदा बसे रहेंगे॥
  30. 0धर्मी अपने मुंह से बुद्धि की बातें करता, और न्याय का वचन कहता है।
  31. 1उसके परमेश्वर की व्यवस्था उसके हृदय में बनी रहती है, उसके पैर नहीं फिसलते॥
  32. 2दुष्ट धर्मी की ताक में रहता है। और उसके मार डालने का यत्न करता है।
  33. 3यहोवा उसको उसके हाथ में न छोड़ेगा, और जब उसका विचार किया जाए तब वह उसे दोषी न ठहराएगा॥
  34. 4यहोवा की बाट जोहता रह, और उसके मार्ग पर बना रह, और वह तुझे बढ़ाकर पृथ्वी का अधिकारी कर देगा, जब दुष्ट काट डाले जाएंगे, तब तू देखेगा॥
  35. 5मैं ने दुष्ट को बड़ा पराक्रमी और ऐसा फैलता हुए देखा, जैसा कोई हरा पेड़ अपने निज भूमि में फैलता है।
  36. 6परन्तु जब कोई उधर से गया तो देखा कि वह वहां है ही नहीं, और मैं ने भी उसे ढूंढ़ा, परन्तु कहीं न पाया॥
  37. 7खरे मनुष्य पर दृष्टि कर और धर्मी को देख, क्योंकि मेल से रहने वाले पुरूष का अन्तफल अच्छा है।
  38. 8परन्तु अपराधी एक साथ सत्यानाश किए जाएंगे, दुष्टों का अन्तफल सर्वनाश है॥
  39. 9धर्मियों की मुक्ति यहोवा की ओर से होती है, संकट के समय वह उनका दृढ़ गढ़ है।
  40. 0और यहोवा उनकी सहायता करके उन को बचाता है, वह उन को दुष्टों से छुड़ाकर उनका उद्धार करता है, इसलिये कि उन्होंने उस में अपनी शरण ली है॥

भजन संहित 38 ↟↟

  1. हे यहोवा क्रोध में आकर मुझे झिड़क न दे, और न जलजलाहट में आकर मेरी ताड़ना कर.
  2. क्योंकि तेरे तीर मुझ में लगे हैं, और मैं तेरे हाथ के नीचे दबा हूं।
  3. तेरे क्रोध के कारण मेरे शरीर में कुछ भी आरोग्यता नहीं, और मेरे पाप के कारण मेरी हडि्डयों में कुछ भी चैन नहीं।
  4. क्योंकि मेरे अधर्म के कामों में मेरा सिर डूब गया, और वे भारी बोझ की नाईं मेरे सहने से बाहर हो गए हैं॥
  5. मेरी मूढ़ता के कारण से मेरे कोड़े खाने के घाव बसाते हैं और सड़ गए हैं।
  6. मैं बहुत दुखी हूं और झुक गया हूं, दिन भर मैं शोक का पहिरावा पहिने हुए चलता फिरता हूं।
  7. क्योंकि मेरी कमर में जलन है, और मेरे शरीर में आरोग्यता नहीं।
  8. मैं निर्बल और बहुत ही चूर हो गया हूं, मैं अपने मन की घबराहट से कराहता हूं॥
  9. हे प्रभु मेरी सारी अभिलाषा तेरे सम्मुख है, और मेरा कराहना तुझ से छिपा नहीं।
  10. 0मेरा हृदय धड़कता है, मेरा बल घटता जाता है, और मेरी आंखों की ज्योति भी मुझ से जाती रही।
  11. 1मेरे मित्र और मेरे संगी मेरी विपत्ति में अलग हो गए, और मेरे कुटुम्बी भी दूर जा खड़े हुए॥
  12. 2मेरे प्राण के ग्राहक मेरे लिये जाल बिछाते हैं, और मेरी हानि के यत्न करने वाले दुष्टता की बातें बोलते, और दिन भर छल की युक्ति सोचते हैं।
  13. 3परन्तु मैं बहिरे की नाईं सुनता ही नहीं, और मैं गूंगे के समान मूंह नहीं खोलता।
  14. 4वरन मैं ऐसे मनुष्य के तुल्य हूं जो कुछ नहीं सुनता, और जिसके मुंह से विवाद की कोई बात नहीं निकलती॥
  15. 5परन्तु हे यहोवा, मैं ने तुझ ही पर अपनी आशा लगाई है, हे प्रभु, मेरे परमेश्वर, तू ही उत्तर देगा।
  16. 6क्योंकि मैं ने कहा, ऐसा न हो कि वे मुझ पर आनन्द करें, जब मेरा पांव फिसल जाता है, तब मुझ पर अपनी बड़ाई मारते हैं॥
  17. 7क्योंकि मैं तो अब गिरने ही पर हूं, और मेरा शोक निरन्तर मेरे साम्हने है।
  18. 8इसलिये कि मैं तो अपने अधर्म को प्रगट करूंगा, और अपने पाप के कारण खेदित रहूंगा।
  19. 9परन्तु मेरे शत्रु फुर्तीले और सामर्थी हैं, और मेरे विरोधी बैरी बहुत हो गए हैं।
  20. 0जो भलाई के बदले में बुराई करते हैं, वह भी मेरे भलाई के पीछे चलने के कारण मुझ से विरोध करते हैं॥
  21. 1हे यहोवा, मुझे छोड़ न दे. हे मेरे परमेश्वर, मुझ से दूर न हो.
  22. 2हे यहोवा, हे मेरे उद्धारकर्त्ता, मेरी सहायता के लिये फुर्ती कर.

भजन संहित 39 ↟↟

  1. मैं ने कहा, मैं अपनी चाल चलन में चौकसी करूंगा, ताकि मेरी जीभ से पाप न हो, जब तक दुष्ट मेरे साम्हने है, तब तक मैं लगाम लगाए अपना मुंह बन्द किए रहूंगा।
  2. मैं मौन धारण कर गूंगा बन गया, और भलाई की ओर से भी चुप्पी साधे रहा, और मेरी पीड़ा बढ़ गई,
  3. मेरा हृदय अन्दर ही अन्दर जल रहा था। सोचते सोचते आग भड़क उठी, तब मैं अपनी जीभ से बोल उठा,
  4. हे यहोवा ऐसा कर कि मेरा अन्त मुझे मालुम हो जाए, और यह भी कि मेरी आयु के दिन कितने हैं, जिस से मैं जान लूं कि कैसा अनित्य हूं.
  5. देख, तू ने मेरे आयु बालिश्त भर की रखी है, और मेरी अवस्था तेरी दृष्टि में कुछ है ही नहीं। सचमुच सब मनुष्य कैसे ही स्थिर क्यों न हों तौभी व्यर्थ ठहरे हैं।
  6. सचमुच मनुष्य छाया सा चलता फिरता है, सचमुच वे व्यर्थ घबराते हैं, वह धन का संचय तो करता है परन्तु नहीं जानता कि उसे कौन लेगा.
  7. और अब हे प्रभु, मैं किस बात की बाट जोहूं? मेरी आशा तो तेरी ओर लगी है।
  8. मुझे मेरे सब अपराधों के बन्धन से छुड़ा ले। मूढ़ मेरी निन्दा न करने पाए।
  9. मैं गूंगा बन गया और मुंह न खोला, क्योंकि यह काम तू ही ने किया है।
  10. 0तू ने जो विपत्ति मुझ पर डाली है उसे मुझ से दूर कर दे, क्योंकि मैं तो तरे हाथ की मार से भस्म हुआ जाता हूं।
  11. 1जब तू मनुष्य को अधर्म के कारण डाँट डपटकर ताड़ना देता है, तब तू उसकी सुन्दरता को पतंगे की नाईं नाश करता है, सचमुच सब मनुष्य व्यर्थअभिमान करते हैं॥
  12. 2हे यहोवा, मेरी प्रार्थना सुन, और मेरी दोहाई पर कान लगा, मेरा रोना सुनकर शांत न रह. क्योंकि मैं तेरे संग एक परदेशी यात्री की नाईं रहता हूं, और अपने सब पुरखाओं के समान परदेशी हूं।
  13. 3आह. इस से पहिले कि मैं यहां से चला जाऊं और न रह जाऊं, मुझे बचा ले जिस से मैं प्रदीप्त जीवन प्राप्त करूं.

भजन संहित 40 ↟↟

  1. मैं धीरज से यहोवा की बाट जोहता रहा, और उसने मेरी ओर झुककर मेरी दोहाई सुनी।
  2. उसने मुझे सत्यानाश के गड़हे और दलदल की कीच में से उबारा, और मुझ को चट्टान पर खड़ा करके मेरे पैरों को दृढ़ किया है।
  3. और उसने मुझे एक नया गीत सिखाया जो हमारे परमेश्वर की स्तुति का है। बहुतेरे यह देखकर डरेंगे, और यहोवा पर भरोसा रखेंगे॥
  4. क्या ही धन्य है वह पुरूष, जो यहोवा पर भरोसा करता है, और अभिमानियों और मिथ्या की ओर मुड़ने वालों की ओर मुंह न फेरता हो।
  5. हे मेरे परमेश्वर यहोवा, तू ने बहुत से काम किए हैं. जो आश्चर्यकर्म और कल्पनाएं तू हमारे लिये करता है वह बहुत सी हैं, तेरे तुल्य कोई नहीं. मैं तो चाहता हूं की खोलकर उनकी चर्चा करूं, परन्तु उनकी गिनती नहीं हो सकती॥
  6. मेलबलि और अन्नबलि से तू प्रसन्न नहीं होता तू ने मेरे कान खोदकर खोले हैं। होमबलि और पापबलि तू ने नहीं चाहा।
  7. तब मैं ने कहा, देख, मैं आया हूं, क्योंकि पुस्तक में मेरे विषय ऐसा ही लिखा हुआ है।
  8. हे मेरे परमेश्वर मैं तेरी इच्छा पूरी करने से प्रसन्न हूं, और तेरी व्यवस्था मेरे अन्त:करण में बनी है॥
  9. मैं ने बड़ी सभा में धर्म के शुभ समाचार का प्रचार किया है, देख, मैं ने अपना मुंह बन्द नहीं किया हे यहोवा, तू इसे जानता है।
  10. 0मैं ने तेरा धर्म मन ही में नहीं रखा, मैं ने तेरी सच्चाई और तेरे किए हुए उधार की चर्चा की है, मैं ने तेरी करूणा और सत्यता बड़ी सभा से गुप्त नहीं रखी॥
  11. 1हे यहोवा, तू भी अपनी बड़ी दया मुझ पर से न हटा ले, तेरी करूणा और सत्यता से निरन्तर मेरी रक्षा होती रहे.
  12. 2क्योंकि मैं अनगिनत बुराइयों से घिरा हुआ हूं, मेरे अधर्म के कामों ने मुझे आ पकड़ा और मैं दृष्टि नहीं उठा सकता, वे गिनती में मेरे सिर के बालों से भी अधिक हैं, इसलिये मेरा हृदय टूट गया॥
  13. 3हे यहोवा, कृपा करके मुझे छुड़ा ले. हे यहोवा, मेरी सहायता के लिये फुर्ती कर.
  14. 4जो मेरे प्राण की खोज में हैं, वे सब लज्जित हों, और उनके मुंह काले हों और वे पीछे हटाए और निरादर किए जाएं जो मेरी हानि से प्रसन्न होते हैं।
  15. 5जो मुझ से आहा, आहा, कहते हैं, वे अपनी लज्जा के मारे विस्मित हों॥
  16. 6परन्तु जितने तुझे ढूंढ़ते हैं, वह सब तेरे कारण हर्षित और आनन्दित हों, जो तेरा किया हुआ उद्धार चाहते हैं, वे निरन्तर कहते रहें, यहोवा की बड़ाई हो.
  17. 7मैं तो दीन और दरिद्र हूं, तौभी प्रभु मेरी चिन्ता करता है। तू मेरा सहायक और छुड़ाने वाला है, हे मेरे परमेश्वर विलम्ब न कर॥




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