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भजन संहिता

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भजन संहित 41 ↟↟

  1. क्या ही धन्य है वह, जो कंगाल की सुधि रखता है. विपत्ति के दिन यहोवा उसको बचाएगा।
  2. यहोवा उसकी रक्षा करके उसको जीवित रखेगा, और वह पृथ्वी पर भाग्यवान होगा। तू उसको शत्रुओं की इच्छा पर न छोड़।
  3. जब वह व्याधि के मारे सेज पर पड़ा हो, तब यहोवा उसे सम्भालेगा, तू रोग में उसके पूरे बिछौने को उलटकर ठीक करेगा॥
  4. मैं ने कहा, हे यहोवा, मुझ पर अनुग्रह कर, मुझ को चंगा कर, क्योंकि मैं ने तो तेरे विरुद्ध पाप किया है.
  5. मेरे शत्रु यह कहकर मेरी बुराई करते हैं: वह कब मरेगा, और उसका नाम कब मिटेगा?
  6. और जब वह मुझ से मिलने को आता है, तब वह व्यर्थ बातें बकता है, जब कि उसका मन अपने अन्दर अधर्म की बातें संचय करता है, और बाहर जाकर उनकी चर्चा करता है।
  7. मेरे सब बैरी मिलकर मेरे विरुद्ध कानाफूसी करते हैं, वे मेरे विरुद्ध होकर मेरी हानि की कल्पना करते हैं॥
  8. वे कहते हैं कि इसे तो कोई बुरा रोग लग गया है, अब जो यह पड़ा है, तो फिर कभी उठने का नहीं।
  9. मेरा परम मित्र जिस पर मैं भरोसा रखता था, जो मेरी रोटी खाता था, उसने भी मेरे विरुद्ध लात उठाई है।
  10. 0परन्तु हे यहोवा, तु मुझ पर अनुग्रह करके मुझ को उठा ले कि मैं उन को बदला दूं.
  11. 1मेरा शत्रु जो मुझ पर जयवन्त नहीं हो पाता, इस से मैं ने जान लिया है कि तू मुझ से प्रसन्न है।
  12. 2और मुझे तो तू खराई से सम्भालता, और सर्वदा के लिये अपने सम्मुख स्थिर करता है॥
  13. 3इस्राएल का परमेश्वर यहोवा आदि से अनन्तकाल तक धन्य है आमीन, फिर आमीन॥

भजन संहित 42 ↟↟

  1. जैसे हरिणी नदी के जल के लिये हांफती है, वैसे ही, हे परमेश्वर, मैं तेरे लिये हांफता हूं।
  2. जीवते ईश्वर परमेश्वर का मैं प्यासा हूं, मैं कब जाकर परमेश्वर को अपना मुंह दिखाऊंगा?
  3. मेरे आंसू दिन और रात मेरा आहार हुए हैं, और लोग दिन भर मुझ से कहते रहते हैं, तेरा परमेश्वर कहां है?
  4. मैं भीड़ के संग जाया करता था, मैं जयजयकार और धन्यवाद के साथ उत्सव करने वाली भीड़ के बीच में परमेश्वर के भवन को धीरे धीरे जाया करता था, यह स्मरण करके मेरा प्राण शोकित हो जाता है।
  5. हे मेरे प्राण, तू क्यों गिरा जाता है? और तू अन्दर ही अन्दर क्यों व्याकुल है? परमेश्वर पर आशा लगाए रह, क्योंकि मैं उसके दर्शन से उद्धार पाकर फिर उसका धन्यवाद करूंगा॥
  6. हे मेरे परमेश्वर, मेरा प्राण मेरे भीतर गिरा जाता है, इसलिये मैं यर्दन के पास के देश से और हर्मोन के पहाड़ों और मिसगार की पहाड़ी के ऊपर से तुझे स्मरण करता हूं।
  7. तेरी जलधाराओं का शब्द सुनकर जल, जल को पुकारता है, तेरी सारी तरंगों और लहरों में मैं डूब गया हूं।
  8. तौभी दिन को यहोवा अपनी शक्ति और करूणा प्रगट करेगा, और रात को भी मैं उसका गीत गाऊंगा, और अपने जीवन दाता ईश्वर से प्रार्थना करूंगा॥
  9. मैं ईश्वर से जो मेरी चट्टान है कहूंगा, तू मुझे क्यों भूल गया? मैं शत्रु के अन्धेर के मारे क्यों शोक का पहिरावा पहिने हुए चलता फिरता हूं?
  10. 0मेरे सताने वाले जो मेरी निन्दा करते हैं मानो उस में मेरी हडि्डयां चूर चूर होती हैं, मानो कटार से छिदी जाती हैं, क्योंकि वे दिन भर मुझ से कहते रहते हैं, तेरा परमेश्वर कहां है?
  11. 1हे मेरे प्राण तू क्यों गिरा जाता है? तू अन्दर ही अन्दर क्यों व्याकुल है? परमेश्वर पर भरोसा रख, क्योंकि वह मेरे मुख की चमक और मेरा परमेश्वर है, मैं फिर उसका धन्यवाद करूंगा॥

भजन संहित 43 ↟↟

  1. हे परमेश्वर, मेरा न्याय चुका और विधर्मी जाति से मेरा मुकद्दमा लड़, मुझ को छली और कुटिल पुरूष से बचा।
  2. क्योंकि हे परमेश्वर, तू ही मेरी शरण है, तू ने क्यों मुझे त्याग दिया है? मैं शत्रु के अन्धेर के मारे शोक का पहिरावा पहिने हुए क्यों फिरता रहूं?
  3. अपने प्रकाश और अपनी सच्चाई को भेज, वे मेरी अगुवाई करें, वे ही मुझ को तेरे पवित्र पर्वत पर और तेरे निवास स्थान में पहुंचाएँ.
  4. तब मैं परमेश्वर की वेदी के पास जाऊंगा, उस ईश्वर के पास जो मेरे अति आनन्द का कुण्ड है, और हे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर मैं वीणा बजा बजाकर तेरा धन्यवाद करूंगा॥
  5. हे मेरे प्राण तू क्यों गिरा जाता है? तू अन्दर ही अन्दर क्यों व्याकुल है? परमेश्वर पर भरोसा रख, क्योंकि वह मेरे मुख की चमक और मेरा परमेश्वर है, मैं फिर उसका धन्यवाद करूंगा॥

भजन संहित 44 ↟↟

  1. हे परमेश्वर हम ने अपने कानों से सुना, हमारे बापदादों ने हम से वर्णन किया है, कि तू ने उनके दिनों में और प्राचीनकाल में क्या क्या काम किए हैं।
  2. तू ने अपने हाथ से जातियों को निकाल दिया, और इन को बसाया, तू ने देश देश के लोगों को दु:ख दिया, और इन को चारों ओर फैला दिया,
  3. क्योंकि वे न तो अपनी तलवार के बल से इस देश के अधिकारी हुए, और न अपने बाहुबल से, परन्तु तेरे दाहिने हाथ और तेरी भुजा और तेरे प्रसन्न मुख के कारण जयवन्त हुए, क्योंकि तू उन को चाहता था॥
  4. हे परमेश्वर, तू ही हमारा महाराजा है, तू याकूब के उद्धार की आज्ञा देता है।
  5. तेरे सहारे से हम अपने द्रोहियों को ढकेलकर गिरा देंगे, तेरे नाम के प्रताप से हम अपने विरोधियों को रौंदेंगे।
  6. क्योंकि मैं अपने धनुष पर भरोसा न रखूंगा, और न अपनी तलवार के बल से बचूंगा।
  7. परन्तु तू ही ने हम को द्रोहियोंसे बचाया है, और हमारे बैरियों को निराश और लज्जित किया है।
  8. हम परमेश्वर की बड़ाई दिन भर करते रहते हैं, और सदैव तेरे नाम का धन्यवाद करते रहेंगे॥
  9. तौभी तू ने अब हम को त्याग दिया और हमारा अनादर किया है, और हमारे दलों के साथ आगे नहीं जाता।
  10. 0तू हम को शत्रु के साम्हने से हटा देता है, और हमारे बैरी मनमाने लूट मार करते हैं।
  11. 1तू ने हमें कसाई की भेडों के समान कर दिया है, और हम को अन्य जातियों में तित्तर बित्तर किया है।
  12. 2तू अपनी प्रजा को सेंत मेंत बेच डालता है, परन्तु उनके मोल से तू धनी नहीं होता॥
  13. 3तू हमारे पड़ोसियों में हमारी नामधराई कराता है, और हमारे चारों ओर से रहने वाले हम से हंसी ठट्ठा करते हैं।
  14. 4तू हम को अन्यजातियों के बीच में उपमा ठहराता है, और देश देश के लोग हमारे कारण सिर हिलाते हैं। दिन भर हमें तिरस्कार सहना पड़ता है,
  15. 5और कलंक लगाने और निन्दा करने वाले के बोल से,
  16. 6और शत्रु और बदला लेने वालों के कारण, बुरा- भला कहने वालों और निन्दा करने वालों के कारण।
  17. 7यह सब कुछ हम पर बीता तौभी हम तुझे नहीं भूले, न तेरी वाचा के विषय विश्वासघात किया है।
  18. 8हमारे मन न बहके, न हमारे पैर तरी बाट से मुड़े,
  19. 9तौभी तू ने हमें गीदड़ों के स्थान में पीस डाला, और हम को घोर अन्धकार में छिपा दिया है॥
  20. 0यदि हम अपने परमेश्वर का नाम भूल जाते, वा किसी पराए देवता की ओर अपने हाथ फैलाते,
  21. 1तो क्या परमेश्वर इसका विचार न करता? क्योंकि वह तो मन की गुप्त बातों को जानता है।
  22. 2परन्तु हम दिन भर तेरे निमित्त मार डाले जाते हैं, और उन भेड़ों के समान समझे जाते हैं जो वध होने पर हैं॥
  23. 3हे प्रभु, जाग. तू क्यों सोता है? उठ. हम को सदा के लिये त्याग न दे.
  24. 4तू क्यों अपना मुंह छिपा लेता है? और हमारा दु:ख और सताया जाना भूल जाता है?
  25. 5हमारा प्राण मिट्टी से लग गया, हमारा पेट भूमि से सट गया है।
  26. 6हमारी सहायता के लिये उठ खड़ा हो. और अपनी करूणा के निमित्त हम को छुड़ा ले॥

भजन संहित 45 ↟↟

  1. मेरा हृदय एक सुन्दर विषय की उमंग से उमण्ड रहा है, जो बात मैं ने राजा के विषय रची है उसको सुनाता हूं, मेरी जीभ निपुण लेखक की लेखनी बनी है।
  2. तू मनुष्य की सन्तानों में परम सुन्दर है, तेरे ओठों में अनुग्रह भरा हुआ है, इसलिये परमेश्वर ने तुझे सदा के लिये आशीष दी है।
  3. हे वीर, तू अपनी तलवार को जो तेरा वैभव और प्रताप है अपनी कटि पर बान्ध.
  4. सत्यता, नम्रता और धर्म के निमित्त अपने ऐश्वर्य और प्रताप पर सफलता से सवार हो, तेरा दहिना हाथ तुझे भयानक काम सिखलाए.
  5. तेरे तीर तो तेज हैं, तेरे साम्हने देश देश के लोग गिरेंगे, राजा के शत्रुओं के हृदय उन से छिदेंगे॥
  6. हे परमेश्वर, तेरा सिंहासन सदा सर्वदा बना रहेगा, तेरा राजदण्ड न्याय का है।
  7. तू ने धर्म से प्रीति और दुष्टता से बैर रखा है। इस कारण परमेश्वर ने हां तेरे परमेश्वर ने तुझ को तेरे साथियों से अधिक हर्ष के तेल से अभिषेक किया है।
  8. तेरे सारे वस्त्र, गन्धरस, अगर, और तेल से सुगन्धित हैं, तू हाथीदांत के मन्दिरों में तार वाले बाजों के कारण आनन्दित हुआ है।
  9. तेरी प्रतिष्ठित स्त्रियों में राजकुमारियां भी हैं, तेरी दाहिनी ओर पटरानी, ओपीर के कुन्दन से विभूषित खड़ी है॥
  10. 0हे राजकुमारी सुन, और कान लगाकर ध्यान दे, अपने लोगों और अपने पिता के घर को भूल जा,
  11. 1और राजा तेरे रूप की चाह करेगा। क्योंकि वह तो तेरा प्रभु है, तू उसे दण्डवत कर।
  12. 2सोर की राजकुमारी भी भेंट करने के लिये उपस्थित होगी, प्रजा के धनवान लोग तुझे प्रसन्न करने का यत्न करेंगे॥
  13. 3राजकुमारी महल में अति शोभायमान है, उसके वस्त्र में सुनहले बूटे कढ़े हुए हैं,
  14. 4वह बूटेदार वस्त्र पहिने हुए राजा के पास पहुंचाई जाएगी। जो कुमारियां उसकी सहेलियां हैं, वे उसके पीछे पीछे चलती हुई तेरे पास पहुंचाई जाएंगी।
  15. 5वे आनन्दित और मगन होकर पहुंचाई जाएंगी, और वे राजा के महल में प्रवेश करेंगी॥
  16. 6तेरे पितरों के स्थान पर तेरे पुत्र होंगे, जिन को तू सारी पृथ्वी पर हाकिम ठहराएगा।
  17. 7मैं ऐसा करूंगा, कि तेरी नाम की चर्चा पीढ़ी से पीढ़ी तक होती रहेगी, इस कारण देश देश के लोग सदा सर्वदा तेरा धन्यवाद करते रहेंगे॥

भजन संहित 46 ↟↟

  1. परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति सहज से मिलने वाला सहायक।
  2. इस कारण हम को कोई भय नहीं चाहे पृथ्वी उलट जाए, और पहाड़ समुद्र के बीच में डाल दिए जाएं,
  3. चाहे समुद्र गरजे और फेन उठाए, और पहाड़ उसकी बाढ़ से कांप उठें॥
  4. एक नदी है जिसकी नहरों से परमेश्वर के नगर में अर्थात परमप्रधान के पवित्र निवास भवन में आनन्द होता है।
  5. परमेश्वर उस नगर के बीच में है, वह कभी टलने का नहीं, पौ फटते ही परमेश्वर उसकी सहायता करता है।
  6. जाति जाति के लोग झल्ला उठे, राज्य राज्य के लोग डगमगाने लगे, वह बोल उठा, और पृथ्वी पिघल गई।
  7. सेनाओं का यहोवा हमारे संग है, याकूब का परमेश्वर हमारा ऊंचा गढ़ है॥
  8. आओ, यहोवा के महाकर्म देखो, कि उसने पृथ्वी पर कैसा कैसा उजाड़ किया है।
  9. वह पृथ्वी की छोर तक लड़ाइयों को मिटाता है, वह धनुष को तोड़ता, और भाले को दो टुकड़े कर डालता है, और रथों को आग में झोंक देता है.
  10. 0चुप हो जाओ, और जान लो, कि मैं ही परमेश्वर हूं। मैं जातियों में महान हूं, मैं पृथ्वी भर में महान हूं.
  11. 1सेनाओं का यहोवा हमारे संग है, याकूब का परमेश्वर हमारा ऊंचा गढ़ है॥

भजन संहित 47 ↟↟

  1. हे देश देश के सब लोगों, तालियां बजाओ. ऊंचे शब्द से परमेश्वर के लिये जयजयकार करो.
  2. क्योंकि यहोवा परमप्रधान और भययोग्य है, वह सारी पृथ्वी के ऊपर महाराजा है।
  3. वह देश के लोगों को हमारे सम्मुख नीचा करता, और अन्यजातियों को हमारे पांवों के नीचे कर देता है।
  4. वह हमारे लिये उत्तम भाग चुन लेगा, जो उसके प्रिय याकूब के घमण्ड का कारण है॥
  5. परमेश्वर जयजयकार सहित, यहोवा नरसिंगे के शब्द के साथ ऊपर गया है।
  6. परमेश्वर का भजन गाओ, भजन गाओ. हमारे महाराजा का भजन गाओ, भजन गाओ.
  7. क्योंकि परमेश्वर सारी पृथ्वी का महाराजा है, समझ बूझकर बुद्धि से भजन गाओ
  8. परमेश्वर जाति जाति पर राज्य करता है, परमेश्वर अपने पवित्र सिंहासन पर विराजमान है।
  9. राज्य राज्य के रईस इब्राहीम के परमेश्वर की प्रजा होने के लिये इकट्ठे हुए हैं। क्योंकि पृथ्वी की ढालें परमेश्वर के वश में हैं, वह तो शिरोमणि है.

भजन संहित 48 ↟↟

  1. हमारे परमेश्वर के नगर में, और अपने पवित्र पर्वत पर यहोवा महान और अति स्तुति के योग्य है.
  2. सिय्योन पर्वत ऊंचाई में सुन्दर और सारी पृथ्वी के हर्ष का कारण है, राजाधिराज का नगर उत्तरी सिरे पर है।
  3. उसके महलों में परमेश्वर ऊंचा गढ़ माना गया है।
  4. क्योंकि देखो, राजा लोग इकट्ठे हुए, वे एक संग आगे बढ़ गए।
  5. उन्होंने आप ही देखा और देखते ही विस्मित हुए, वे घबराकर भाग गए।
  6. वहां कपकपी ने उन को आ पकड़ा, और जच्चा की सी पीड़ाएं उन्हें होने लगीं।
  7. तू पूर्वी वायु से तर्शीश के जहाजों को तोड़ डालता है।
  8. सेनाओं के यहोवा के नगर में, अपने परमेश्वर के नगर में, जैसा हम ने सुना था, वैसा देखा भी है, परमेश्वर उसको सदा दृढ़ और स्थिर रखेगा॥
  9. हे परमेश्वर हम ने तेरे मन्दिर के भीतर तेरी करूणा पर ध्यान किया है।
  10. 0हे परमेश्वर तेरे नाम के योग्य तेरी स्तुति पृथ्वी की छोर तक होती है। तेरा दाहिना हाथ धर्म से भरा है,
  11. 1तेरे न्याय के कामों के कारण सिय्योन पर्वत आनन्द करे, और यहूदा के नगर की पुत्रियां मगन हों.
  12. 2सिय्योन के चारों ओर चलो, और उसकी परिक्रमा करो, उसके गुम्मटों को गिन लो,
  13. 3उसकी शहरपनाह पर दृष्टि लगाओ, उसके महलों को ध्यान से देखो, जिस से कि तुम आने वाली पीढ़ी के लोगों से इस बात का वर्णन कर सको।
  14. 4क्योंकि वह परमेश्वर सदा सर्वदा हमारा परमेश्वर है, वह मृत्यु तक हमारी अगुवाई करेगा॥

भजन संहित 49 ↟↟

  1. हे देश देश के सब लोगों यह सुनो. हे संसार के सब निवासियों, कान लगाओ.
  2. क्या ऊंच, क्या नीच क्या धनी, क्या दरिद्र, कान लगाओ.
  3. मेरे मुंह से बुद्धि की बातें निकलेंगी, और मेरे हृदय की बातें समझ की होंगी।
  4. मैं नीतिवचन की ओर अपना कान लगाऊंगा, मैं वीणा बजाते हुए अपनी गुप्त बात प्रकाशित करूंगा॥
  5. विपत्ति के दिनों में जब मैं अपने अड़ंगा मारने वालों की बुराइयों से घिरूं, तब मैं क्यों डरूं?
  6. जो अपनी सम्पत्ति पर भरोसा रखते, और अपने धन की बहुतायत पर फूलते हैं,
  7. उन में से कोई अपने भाई को किसी भांति छुड़ा नहीं सकता है, और न परमेश्वर को उसकी सन्ती प्रायश्चित्त में कुछ दे सकता है,
  8. (क्योंकि उनके प्राण की छुड़ौती भारी है वह अन्त तक कभी न चुका सकेंगे)।
  9. कोई ऐसा नहीं जो सदैव जीवित रहे, और कब्र को न देखे॥
  10. 0क्योंकि देखने में आता है, कि बुद्धिमान भी मरते हैं, और मूर्ख और पशु सरीखे मनुष्य भी दोनोंनाश होते हैं, और अपनी सम्पत्ति औरों के लिये छोड़ जाते हैं।
  11. 1वे मन ही मन यह सोचते हैं, कि उनका घर सदा स्थिर रहेगा, और उनके निवास पीढ़ी से पीढ़ी तक बने रहेंगे, इसलिये वे अपनी अपनी भूमि का नाम अपने अपने नाम पर रखते हैं।
  12. 2परन्तु मनुष्य प्रतिष्ठा पाकर भी स्थिर नहीं रहता, वह पशुओं के समान होता है, जो मर मिटते हैं॥
  13. 3उनकी यह चाल उनकी मूर्खता है, तौभी उनके बाद लोग उनकी बातों से प्रसन्न होते हैं।
  14. 4वे अधोलोक की मानों भेड़- बकरियां ठहराए गए हैं, मृत्यु उनका गड़ेरिया ठहरी, और बिहान को सीधे लोग उन पर प्रभुता करेंगे, और उनका सुन्दर रूप अधोलोक का कौर हो जाएगा और उनका कोई आधार न रहेगा।
  15. 5परन्तु परमेश्वर मेरे प्राण को अधोलोक के वश से छुड़ा लेगा, क्योंकि वही मुझे ग्रहण कर अपनाएगा॥
  16. 6जब कोई धनी हो जाए और उसके घर का वैभव बढ़ जाए, तब तू भय न खाना।
  17. 7क्योंकि वह मर कर कुछ भी साथ न ले जाएगा, न उसका वैभव उसके साथ कब्र में जाएगा।
  18. 8चाहे वह जीते जी अपने आप को धन्य कहता रहे, (जब तू अपनी भलाई करता है, तब वे लोग तेरी प्रशंसा करते हैं)
  19. 9तौभी वह अपने पुरखाओं के समाज में मिलाया जाएगा, जो कभी उजियाला न देखेंगे।
  20. 0मनुष्य चाहे प्रतिष्ठित भी हों परन्तु यदि वे समझ नहीं रखते, तो वे पशुओं के समान हैं जो मर मिटते हैं॥

भजन संहित 50 ↟↟

  1. ईश्वर परमेश्वर यहोवा ने कहा है, और उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक पृथ्वी के लोगों को बुलाया है।
  2. सिय्योन से, जो परम सुन्दर है, परमेश्वर ने अपना तेज दिखाया है।
  3. हमारा परमेश्वर आएगा और चुपचाप न रहेगा, आग उसके आगे आगे भस्म करती जाएगी, और उसके चारों ओर बड़ी आंधी चलेगी।
  4. वह अपनी प्रजा का न्याय करने के लिये ऊपर से आकाश को और पृथ्वी को भी पुकारेगा:
  5. मेरे भक्तों को मेरे पास इकट्ठा करो, जिन्होंने बलिदान चढ़ाकर मुझ से वाचा बान्धी है.
  6. और स्वर्ग उसके धर्मी होने का प्रचार करेगा क्योंकि परमेश्वर तो आप ही न्यायी है॥
  7. हे मेरी प्रजा, सुन, मैं बोलता हूं, और हे इस्राएल, मैं तेरे विषय साक्षी देता हूं। परमेश्वर तेरा परमेश्वर मैं ही हूं।
  8. मैं तुझ पर तेरे मेल बलियों के विषय दोष नहीं लगाता, तेरे होमबलि तो नित्य मेरे लिये चढ़ते हैं।
  9. मैं न तो तेरे घर से बैल न तेरे पशुशालों से बकरे ले लूंगा।
  10. 0क्योंकि वन के सारे जीवजन्तु और हजारों पहाड़ों के जानवर मेरे ही हैं।
  11. 1पहाड़ों के सब पक्षियों को मैं जानता हूं, और मैदान पर चलने फिरने वाले जानवार मेरे ही हैं॥
  12. 2यदि मैं भूखा होता तो तुझ से न कहता, क्योंकि जगत और जो कुछ उस में है वह मेरा है।
  13. 3क्या मैं बैल का मांस खाऊं, वा बकरों का लोहू पीऊं?
  14. 4परमेश्वर को धन्यवाद ही का बलिदान चढ़ा, और परमप्रधान के लिये अपनी मन्नतें पूरी कर,
  15. 5और संकट के दिन मुझे पुकार, मैं तुझे छुड़ाऊंगा, और तू मेरी महिमा करने पाएगा॥
  16. 6परन्तु दुष्ट से परमेश्वर कहता है: तुझे मेरी विधियों का वर्णन करने से क्या काम? तू मेरी वाचा की चर्चा क्यों करता है?
  17. 7तू तो शिक्षा से बैर करता, और मेरे वचनों को तुच्छ जानता है।
  18. 8जब तू ने चोर को देखा, तब उसकी संगति से प्रसन्न हुआ, और परस्त्रीगामियों के साथ भागी हुआ॥
  19. 9तू ने अपना मुंह बुराई करने के लिये खोला, और तेरी जीभ छल की बातें गढ़ती है।
  20. 0तू बैठा हुआ अपने भाई के विरुद्ध बोलता, और अपने सगे भाई की चुगली खाता है।
  21. 1यह काम तू ने किया, और मैं चुप रहा, इसलिये तू ने समझ लिया कि परमेश्वर बिलकुल मेरे समान है। परन्तु मैं तुझे समझाऊंगा, और तेरी आंखों के साम्हने सब कुछ अलग अलग दिखाऊंगा॥
  22. 2हे ईश्वर को भूलने वालों यह बात भली भांति समझ लो, कहीं ऐसा न हो कि मैं तुम्हें फाड़ डालूं, और कोई छुड़ाने वाला न हो.
  23. 3धन्यवाद के बलिदान का चढ़ाने वाला मेरी महिमा करता है, और जो अपना चरित्र उत्तम रखता है उसको मैं परमेश्वर का किया हुआ उद्धार दिखाऊंगा.

भजन संहित 51 ↟↟

  1. हे परमेश्वर, अपनी करूणा के अनुसार मुझ पर अनुग्रह कर, अपनी बड़ी दया के अनुसार मेरे अपराधों को मिटा दे।
  2. मुझे भलीं भांति धोकर मेरा अधर्म दूर कर, और मेरा पाप छुड़ाकर मुझे शुद्ध कर.
  3. मैं तो अपने अपराधों को जानता हूं, और मेरा पाप निरन्तर मेरी दृष्टि में रहता है।
  4. मैं ने केवल तेरे ही विरुद्ध पाप किया, और जो तेरी दृष्टि में बुरा है, वही किया है, ताकि तू बोलने में धर्मी और न्याय करने में निष्कलंक ठहरे।
  5. देख, मैं अधर्म के साथ उत्पन्न हुआ, और पाप के साथ अपनी माता के गर्भ में पड़ा॥
  6. देख, तू हृदय की सच्चाई से प्रसन्न होता है, और मेरे मन ही में ज्ञान सिखाएगा।
  7. जूफा से मुझे शुद्ध कर, तो मैं पवित्र हो जाऊंगा, मुझे धो, और मैं हिम से भी अधिक श्वेत बनूंगा।
  8. मुझे हर्ष और आनन्द की बातें सुना, जिस से जो हडि्डयां तू ने तोड़ डाली हैं वह मगन हो जाएं।
  9. अपना मुख मेरे पापों की ओर से फेर ले, और मेरे सारे अधर्म के कामों को मिटा डाल॥
  10. 0हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर, और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नये सिरे से उत्पन्न कर।
  11. 1मुझे अपने साम्हने से निकाल न दे, और अपने पवित्र आत्मा को मुझ से अलग न कर।
  12. 2अपने किए हुए उद्धार का हर्ष मुझे फिर से दे, और उदार आत्मा देकर मुझे सम्भाल॥
  13. 3तब मैं अपराधियों को तेरा मार्ग सिखाऊंगा, और पापी तेरी ओर फिरेंगे।
  14. 4हे परमेश्वर, हे मेरे उद्धारकर्ता परमेश्वर, मुझे हत्या के अपराध से छुड़ा ले, तब मैं तेरे धर्म का जयजयकार करने पाऊंगा॥
  15. 5हे प्रभु, मेरा मुंह खोल दे तब मैं तेरा गुणानुवाद कर सकूंगा।
  16. 6क्योंकि तू मेलबलि से प्रसन्न नहीं होता, नहीं तो मैं देता, होमबलि से भी तू प्रसन्न नहीं होता।
  17. 7टूटा मन परमेश्वर के योग्य बलिदान है, हे परमेश्वर, तू टूटे और पिसे हुए मन को तुच्छ नहीं जानता॥
  18. 8प्रसन्न होकर सिय्योन की भलाई कर, यरूशलेम की शहरपनाह को तू बना,
  19. 9तब तू धर्म के बलिदानों से अर्थात सर्वांग पशुओं के होमबलि से प्रसन्न होगा, तब लोग तेरी वेदी पर बैल चढ़ाएंगे॥

भजन संहित 52 ↟↟

  1. हे वीर, तू बुराई करने पर क्यों घमण्ड करता है? ईश्वर की करूणा तो अनन्त है।
  2. तेरी जीभ केवल दुष्टता गढ़ती है, सान धरे हुए अस्तुरे की नाईं वह छल का काम करती है।
  3. तू भलाई से बढ़कर बुराई में और धर्म की बात से बढ़कर झूठ से प्रीति रखता है।
  4. हे छली जीभ तू सब विनाश करने वाली बातों से प्रसन्न रहती है॥
  5. हे ईश्वर तुझे सदा के लिये नाश कर देगा, वह तुझे पकड़ कर तेरे डेरे से निकाल देगा, और जीवतों के लोक में से तुझे उखाड़ डालेगा।
  6. तब धर्मी लोग इस घटना को देखकर डर जाएंगे, और यह कहकर उस पर हंसेंगे, कि
  7. देखो, यह वही पुरूष है जिसने परमेश्वर को अपनी शरण नहीं माना, परन्तु अपने धन की बहुतायत पर भरोसा रखता था, और अपने को दुष्टता में दृढ़ करता रहा.
  8. परन्तु मैं तो परमेश्वर के भवन में हरे जलपाई के वृक्ष के समान हूं। मैं ने परमेश्वर की करूणा पर सदा सर्वदा के लिये भरोसा रखा है।
  9. मैं तेरा धन्यवाद सर्वदा करता रहूंगा, क्योंकि तू ही ने यह काम किया है। मैं तेरे ही नाम की बाट जोहता रहूंगा, क्योंकि यह तेरे पवित्र भक्तों के साम्हने उत्तम है॥

भजन संहित 53 ↟↟

  1. मूढ़ ने अपने मन में कहा है, कि कोई परमेश्वर है ही नहीं। वे बिगड़ गए, उन्होंने कुटिलता के घिनौने काम किए हैं, कोई सुकर्मी नहीं॥
  2. परमेश्वर ने स्वर्ग पर से मनुष्यों के ऊपर दृष्टि की ताकि देखे कि कोई बुद्धि से चलने वाला वा परमेश्वर को पूछने वाला है कि नहीं॥
  3. वे सब के सब हट गए, सब एक साथ बिगड़ गए, कोई सुकर्मी नहीं, एक भी नहीं॥ क्या उन सब अनर्थकारियों को कुछ भी ज्ञान नहीं?
  4. जो मेरे लोगों को ऐसे खाते हैं जैसे रोटी और परमेश्वर का नाम नहीं लेते?
  5. वहां उन पर भय छा गया जहां भय का कोई कारण न था। क्योंकि यहोवा ने उनकी हडि्डयों को, जो तेरे विरुद्ध छावनी डाले पड़े थे, तितर बितर कर दिया, तू ने तो उन्हें लज्जित कर दिया इसलिये कि परमेश्वर ने उन को निकम्मा ठहराया है॥
  6. भला होता कि इस्राएल का पूरा उद्धार सिय्योन से निकलता. जब परमेश्वर अपनी प्रजा को बन्धुवाई से लौटा ले आएगा तब याकूब मगन और इस्राएल आनन्दित होगा॥

भजन संहित 54 ↟↟

  1. हे परमेश्वर अपने नाम के द्वारा मेरा उद्धार कर, और अपने पराक्रम से मेरा न्याय कर।
  2. हे परमेश्वर, मेरी प्रार्थना सुन ले, मेरे मुंह के वचनों की ओर कान लगा॥
  3. क्योंकि परदेशी मेरे विरुद्ध उठे हैं, और बलात्कारी मेरे प्राण के ग्राहक हुए हैं, उन्होंने परमेश्वर को अपने सम्मुख नहीं जाना॥
  4. देखो, परमेश्वर मेरा सहायक है, प्रभु मेरे प्राण के सम्भालने वालों के संग है।
  5. वह मेरे द्रोहियों की बुराई को उन्हीं पर लौटा देगा, हे परमेश्वर, अपनी सच्चाई के कारण उन्हें विनाश कर॥
  6. मैं तुझे स्वेच्छाबलि चढ़ाऊंगा, हे यहोवा, मैं तेरे नाम का धन्यवाद करूंगा, क्योंकि यह उत्तम है।
  7. क्योंकि तू ने मुझे सब दुखों से छुड़ाया है, और मैं अपने शत्रुओं पर दृष्टि करके सन्तुष्ट हुआ हूं॥

भजन संहित 55 ↟↟

  1. हे परमेश्वर, मेरी प्रार्थना की ओर कान लगा, और मेरी गिड़गिड़ाहट से मुंह न मोड़.
  2. मेरी ओर ध्यान देकर, मुझे उत्तर दे, मैं चिन्ता के मारे छटपटाता हूं और व्याकुल रहता हूं।
  3. क्योंकि शत्रु कोलाहल और दुष्ट उपद्रव कर रहें हैं, वे मुझ पर दोषारोपण करते हैं, और क्रोध में आकर मुझे सताते हैं॥
  4. मेरा मन भीतर ही भीतर संकट में है, और मृत्यु का भय मुझ में समा गया है।
  5. भय और कंपकपी ने मुझे पकड़ लिया है, और भय के कारण मेरे रोंए रोंए खड़े हो गए हैं।
  6. और मैं ने कहा, भला होता कि मेरे कबूतर के से पंख होते तो मैं उड़ जाता और विश्राम पाता.
  7. देखो, फिर तो मैं उड़ते उड़ते दूर निकल जाता और जंगल में बसेरा लेता,
  8. मैं प्रचण्ड बयार और आन्धी के झोंके से बचकर किसी शरण स्थान में भाग जाता॥
  9. हे प्रभु, उन को सत्यानाश कर, और उनकी भाषा में गड़बड़ी डाल दे, क्योंकि मैं ने नगर में उपद्रव और झगड़ा देखा है।
  10. 0रात दिन वे उसकी शहरपनाह पर चढ़कर चारों ओर घूमते हैं, और उसके भीतर दुष्टता और उत्पात होता है।
  11. 1उसके भीतर दुष्टता ने बसेरा डाला है, और अन्धेर, अत्याचार और छल उसके चौक से दूर नहीं होते॥
  12. 2जो मेरी नामधराई करता है वह शत्रु नहीं था, नहीं तो मैं उसको सह लेता, जो मेरे विरुद्ध बड़ाई मारता है वह मेरा बैरी नहीं है, नहीं तो मैं उससे छिप जाता।
  13. 3परन्तु वह तो तू ही था जो मेरी बराबरी का मनुष्य मेरा परममित्र और मेरी जान पहचान का था।
  14. 4हम दोनों आपस में कैसी मीठी मीठी बातें करते थे, हम भीड़ के साथ परमेश्वर के भवन को जाते थे।
  15. 5उन को मृत्यु अचानक आ दबाए, वे जीवित ही अधोलोक में उतर जाएं, क्योंकि उनके घर और मन दोनों में बुराइयां और उत्पात भरा है॥
  16. 6परन्तु मैं तो परमेश्वर को पुकारूंगा, और यहोवा मुझे बचा लेगा।
  17. 7सांझ को, भोर को, दोपहर को, तीनों पहर मैं दोहाई दूंगा और कराहता रहूंगा। और वह मेरा शब्द सुन लेगा।
  18. 8जो लड़ाई मेरे विरुद्ध मची थी उससे उसने मुझे कुशल के साथ बचा लिया है। उन्होंने तो बहुतों को संग लेकर मेरा साम्हना किया था।
  19. 9ईश्वर जो आदि से विराजमान है यह सुनकर उन को उत्तर देगा। ये वे हैं जिन में कोई परिवर्तन नहीं और उन में परमेश्वर का भय है ही नहीं॥
  20. 0उसने अपने मेल रखने वालों पर भी हाथ छोड़ा है, उसने अपनी वाचा को तोड़ दिया है।
  21. 1उसके मुंह की बातें तो मक्खन सी चिकनी थी परन्तु उसके मन में लड़ाई की बातें थीं, उसके वचन तेल से अधिक नरम तो थे परन्तु नंगी तलवारें थीं॥
  22. 2अपना बोझ यहोवा पर डाल दे वह तुझे सम्भालेगा, वह धर्मी को कभी टलने न देगा॥
  23. 3परन्तु हे परमेश्वर, तू उन लोगों को विनाश के गड़हे में गिरा देगा, हत्यारे और छली मनुष्य अपनी आधी आयु तक भी जीवित न रहेंगे। परन्तु मैं तुझ पर भरोसा रखे रहूंगा॥

भजन संहित 56 ↟↟

  1. हे परमेश्वर, मुझ पर अनुग्रह कर, क्योंकि मनुष्य मुझे निगलना चाहते हैं। वे दिन भर लड़कर मुझे सताते हैं।
  2. मेरे द्रोही दिन भर मुझे निगलना चाहते हैं, क्योंकि जो लोग अभिमान करके मुझ से लड़ते हैं वे बहुत हैं।
  3. जिस समय मुझे डर लगेगा, मैं तुझ पर भरोसा रखूंगा।
  4. परमेश्वर की सहायता से मैं उसके वचन की प्रशंसा करूंगा, परमेश्वर पर मैं ने भरोसा रखा है, मैं नहीं डरूंगा। कोई प्राणी मेरा क्या कर सकता है?
  5. वे दिन भर मेरे वचनों को, उलटा अर्थ लगा लगाकर मरोड़ते रहते हैं उनकी सारी कल्पनाएं मेरी ही बुराई करने की होती है।
  6. वे सब मिलकर इकट्ठे होते हैं और छिपकर बैठते हैं, वे मेरे कदमों को देखते भालते हैं मानों वे मेरे प्राणों की घात में ताक लगाए बैठें हों।
  7. क्या वे बुराई करके भी बच जाएंगे? हे परमेश्वर, अपने क्रोध से देश देश के लोगों को गिरा दे.
  8. तू मेरे मारे मारे फिरने का हिसाब रखता है, तू मेरे आंसुओं को अपनी कुप्पी में रख ले. क्या उनकी चर्चा तेरी पुस्तक में नहीं है?
  9. जब जिस समय मैं पुकारूंगा, उसी समय मेरे शत्रु उलटे फिरेंगे। यह मैं जानता हूं, कि परमेश्वर मेरी ओर है।
  10. 0परमेश्वर की सहायता से मैं उसके वचन की प्रशंसा करूंगा, यहोवा की सहायता से मैं उसके वचन की प्रशंसा करूंगा।
  11. 1मैं ने परमेश्वर पर भरोसा रखा है, मैं न डरूंगा। मनुष्य मेरा क्या कर सकता है?
  12. 2हे परमेश्वर, तेरी मन्नतों का भार मुझ पर बना है, मैं तुझ को धन्यवाद बलि चढ़ाऊंगा।
  13. 3क्योंकि तू ने मुझ को मृत्यु से बचाया है, तू ने मेरे पैरों को भी फिसलने से बचाया है, ताकि मैं ईश्वर के साम्हने जीवतों के उजियाले में चलूं फिरूं?

भजन संहित 57 ↟↟

  1. हे परमेश्वर, मुझ पर अनुग्रह कर, मुझ पर अनुग्रह कर, क्योंकि मैं तेरा शरणागत हूं, और जब तक ये आपत्तियां निकल न जाएं, तब तक मैं तेरे पंखों के तले शरण लिए रहूंगा।
  2. मैं परम प्रधान परमेश्वर को पुकारूंगा, ईश्वर को जो मेरे लिये सब कुछ सिद्ध करता है।
  3. ईश्वर स्वर्ग से भेजकर मुझे बचा लेगा, जब मेरा निगलने वाला निन्दा कर रहा हो। परमेश्वर अपनी करूणा और सच्चाई प्रगट करेगा॥
  4. मेरा प्राण सिंहों के बीच में है, मुझे जलते हुओं के बीच में लेटना पड़ता है, अर्थात ऐसे मनुष्यों के बीच में जिन के दांत बर्छी और तीर हैं, और जिनकी जीभ तेज तलवार है॥
  5. हे परमेश्वर तू स्वर्ग के ऊपर अति महान और तेजोमय है, तेरी महिमा सारी पृथ्वी के ऊपर फैल जाए.
  6. उन्होंने मेरे पैरों के लिये जाल लगाया है, मेरा प्राण ढला जाता है। उन्होंने मेरे आगे गड़हा खोदा, परन्तु आप ही उस में गिर पड़े॥
  7. हे परमेश्वर, मेरा मन स्थिर है, मेरा मन स्थिर है, मैं गाऊंगा वरन भजन कीर्तन करूंगा।
  8. हे मेरी आत्मा जाग जा. हे सारंगी और वीणा जाग जाओ। मैं भी पौ फटते ही जाग उठूंगा।
  9. हे प्रभु, मैं देश के लोगों के बीच तेरा धन्यवाद करूंगा, मैं राज्य राज्य के लोगों के बीच में तेरा भजन गाऊंगा।
  10. 0क्योंकि तेरी करूणा स्वर्ग तक बड़ी है, और तेरी सच्चाई आकाशमण्डल तक पहुंचती है॥
  11. 1हे परमेश्वर, तू स्वर्ग के ऊपर अति महान है. तेरी महिमा सारी पृथ्वी के ऊपर फैल जाए.

भजन संहित 58 ↟↟

  1. हे मनुष्यों, क्या तुम सचमुच धर्म की बात बोलते हो? और हे मनुष्यवंशियों क्या तुम सीधाई से न्याय करते हो?
  2. नहीं, तुम मन ही मन में कुटिल काम करते हो, तुम देश भर में उपद्रव करते जाते हो॥
  3. दुष्ट लोग जन्मते ही पराए हो जाते हैं, वे पेट से निकलते ही झूठ बोलते हुए भटक जाते हैं।
  4. उन में सर्प का सा विष है, वे उस नाम के समान हैं, जो सुनना नहीं चाहता,
  5. और सपेरा कैसी ही निपुणता से क्योंन मंत्र पढ़े, तौभी उसकी नहीं सुनता॥
  6. हे परमेश्वर, उनके मुंह में से दांतों को तोड़ दे, हे यहोवा उन जवान सिंहों की दाढ़ों को उखाड़ डाल.
  7. वे घुलकर बहते हुए पानी के समान हो जाएं, जब वे अपने तीर चढ़ाएं, तब तीर मानों दो टुकड़े हो जाएं।
  8. वे घोंघे के समान हो जाएं जो घुलकर नाश हो जाता है, और स्त्री के गिरे हुए गर्भ के समान हो जिसने सूरज को देखा ही नहीं।
  9. उससे पहिले कि तुम्हारी हांडियों में कांटों की आंच लगे, हरे व जले, दोनों को वह बवंडर से उड़ा ले जाएगा॥
  10. 0धर्मी ऐसा पलटा देखकर आनन्दित होगा, वह अपने पांव दुष्ट के लोहू में धोएगा॥
  11. 1तब मनुष्य कहने लगेंगे, निश्चय धर्मी के लिये फल है, निश्चय परमेश्वर है, जो पृथ्वी पर न्याय करता है॥

भजन संहित 59 ↟↟

  1. हे मेरे परमेश्वर, मुझ को शत्रुओं से बचा, मुझे ऊंचे स्थान पर रखकर मेरे विरोधियों से बचा,
  2. मुझ को बुराई करने वालों के हाथ से बचा, और हत्यारों से मेरा उद्धार कर॥
  3. क्योंकि देख, वे मेरी घात में लगे हैं, हे यहोवा, मेरा कोई दोष वा पाप नहीं है, तौभी बलवन्त लोग मेरे विरुद्ध इकट्ठे होते हैं।
  4. वह मुझ निर्दोष पर दौड़ें, दौड़कर लड़ने को तैयार हो जाते हैं॥ मुझ से मिलने के लिये जाग उठ, और यह देख.
  5. हे सेनाओं के परमेश्वर यहोवा, हे इस्राएल के परमेश्वर सब अन्यजाति वालों को दण्ड देने के लिये जाग, किसी विश्वासघाती अत्याचारी पर अनुग्रह न कर॥
  6. वे लोग सांझ को लौटकर कुत्ते की नाईं गुर्राते हैं, और नगर के चारों ओर घूमते हैं। देख वे डकारते हैं,
  7. उनके मुंह के भीतर तलवारें हैं, क्योंकि वे कहते हैं, कौन सुनता है?
  8. परन्तु हे यहोवा, तू उन पर हंसेगा, तू सब अन्य जातियों को ठट्ठों में उड़ाएगा।
  9. हे मेरे बल, मुझे तेरी ही आस होगी, क्योंकि परमेश्वर मेरा ऊंचा गढ़ है॥
  10. 0परमेश्वर करूणा करता हुआ मुझ से मिलेगा, परमेश्वर मेरे द्रोहियों के विषय मेरी इच्छा पूरी कर देगा॥
  11. 1उन्हें घात न कर, न हो कि मेरी प्रजा भूल जाए, हे प्रभु, हे हमारी ढाल. अपनी शक्ति से उन्हें तितर बितर कर, उन्हें दबा दे।
  12. 2वह अपने मुंह के पाप, और ओठों के वचन, और शाप देने, और झूठ बोलने के कारण, अभिमान में फंसे हुए पकड़े जाएं।
  13. 3जलजलाहट में आकर उनका अन्त कर, उनका अन्त कर दे ताकि वे नष्ट हो जाएं तब लोग जानेंगे कि परमेश्वर याकूब पर, वरन पृथ्वी की छोर तक प्रभुता करता है॥
  14. 4वे सांझ को लौटकर कुत्ते की नाईं गुर्राएं, और नगर के चारों ओर घूमें।
  15. 5वे टुकड़े के लिये मारे मारे फिरें, और तृप्त न होने पर रात भर वहीं ठहरे रहें॥
  16. 6परन्तु मैं तेरी सामर्थ्य का यश गाऊंगा, और भोर को तेरी करूणा का जयजयकार करूंगा। क्योंकि तू मेरा ऊंचा गढ़ है, और संकट के समय मेरा शरणस्थान ठहरा है।
  17. 7हे मेरे बल, मैं तेरा भजन गाऊंगा, क्योंकि हे परमेश्वर, तू मेरा ऊंचा गढ़ और मेरा करूणामय परमेश्वर है॥

भजन संहित 60 ↟↟

  1. हे परमेश्वर तू ने हम को त्याग दिया, और हम को तोड़ डाला है, तू क्रोधित हुआ, फिर हम को ज्यों का त्यों कर दे।
  2. तू ने भूमि को कंपाया और फाड़ डाला है, उसकी दरारों को भर दे, क्योंकि वह डगमगा रही है।
  3. तू ने अपनी प्रजा को कठिन दु:ख भुगताया, तू ने हमें लड़खड़ा देने वाला दाखमधु पिलाया है॥
  4. तू ने अपने डरवैयों को झण्डा दिया है, कि वह सच्चाई के कारण फहराया जाए।
  5. तू अपने दाहिने हाथ से बचा, और हमारी सुन ले कि तेरे प्रिय छुड़ाए जाएं॥
  6. परमेश्वर पवित्रता के साथ बोला है मैं प्रफुल्लित हूंगा, मैं शकेम को बांट लूंगा, और सुक्कोत की तराई को नपवाऊंगा।
  7. गिलाद मेरा है, मनश्शे भी मेरा है, और एप्रैम मेरे सिर का टोप, यहूदा मेरा राजदण्ड है।
  8. मोआब मेरे धोने का पात्रा है, मैं एदोम पर अपना जूता फेंकूंगा, हे पलिश्तीन मेरे ही कारण जयजयकार कर॥
  9. मुझे गढ़ वाले नगर में कौन पहुंचाएगा? एदोम तक मेरी अगुवाई किस ने की है?
  10. 0हे परमेश्वर, क्या तू ने हम को त्याग नही दिया? हे परमेश्वर, तू हमारी सेना के साथ नहीं जाता।
  11. 1द्रोही के विरुद्ध हमारी सहायता कर, क्योंकि मनुष्य का किया हुआ छुटकारा व्यर्थ होता है।
  12. 2परमेश्वर की सहायता से हम वीरता दिखाएंगे, क्योंकि हमारे द्रोहियों को वही रौंदेगा॥




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